संस्मरण : और पुजापा रहीम को
गाड़ी धीमी हो कर रुक गयी थी। बगल के कंपार्टमेंट से किसी महिला के लगातार बोलने की आवाज़ से ही शायद मेरी नींद टूटी थी। उसकी आवाज़ में अजीब सी तल्ख़ी थी। बोलते-बोलते कभी उसका स्वर रुआँसा हो जाता तो कभी कठोर। उसके सामने की सीट पर बैठा यात्री केवल हाँ-हूँ के जवाब में उसे सुनता जा रहा था। मैंने घड़ी देखी। सुबह के दस बज रहे थे। मुंबई-फ़ैजाबाद साकेत एक्सप्रेस के फ़ैजाबाद पहुँचने का यही समय था। गाड़ी स्टेशन से कुछ ही दूर पुल के पास खड़ी थी। अब सोने का कोई मतलब नहीं था। मैं नीचे उतर कर साइड वाली बर्थ पर बैठ गयी। पापा-मम्मी उतरने के लिए तैयार बैठे थे। अचानक याद आया कि आज गणेश चतुर्थी है। मुंबई का बेहद खास दिन...! चारों ओर बाजे-गाजे के धूम धड़ाके के साथ छोटे-बड़े सार्वजानिक पंडालों तथा गणेश भक्तों सहित अन्य कई मुंबईकरों के घरों में गणपति प्रतिमा का आगमन हो चुका होगा। ‘जय देव-जय देव, जय मंगल मूर्ति...’ के सामूहिक स्वर घोष के साथ स्वादिष्ट मोदकों का भोग लग चुका होगा। पंडालों में जगह-जगह दर्शनार्थियों का ताँता लग रहा होगा। हर साल कॉलेजों में केवल एक ही दिन की छुट्टी मिलती थी लेकिन इस बार गणेशोत्सव की पूरे ...