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संस्मरण : मैं होली नहीं खेलती

मुंबई में वैसी होली खेली भी नहीं जाती जैसी कि उत्तर भारत में। यहाँ होली सुबह से दोपहर तक अर्थात कुल आधे दिन का खेल होती है। जब हम छोटे थे तो मोहल्ले के सारे बच्चे एक - दूसरे पर पिचकारी से रंगों की बौछार करके खुश हो लेते। घंटे-दो-घंटे में पिचकारी के इस खेल से हमारा मन भर जाता। कपड़े भीग जाते। गीले कपड़ों में कंपकपी आने लगती तब माँ हमें नहला कर साफ कपड़े पहना देती और हमारी होली मन जाती। शाम को पापा के मित्र या मम्मी की कुछ सहेलियाँ घर आतीं, वे एक दूसरे को रंग का टीका लगाते, मिठाइयों का आदान प्रदान होता, वे आपस में हँसते - बतियाते और होली का यह अजीब सा त्योहार पूरा हो जाता। पिचकारी से भिगो देने वाली वह प्यारी सी होली मेरे बालमन को बहुत भाती। बचपन बीता। जिस दिन होली के रंगों ने पिचकारी की सीमा पार कर मेरे गालों को छुआ, उसी दिन से मैंने होली खेलना छोड़ दिया। होली के दिन लोग क्या-क्या नहीं करते। मुँह पर रंग पोतते हैं। (कई बार कीचड़ या ऑयल पेंट भी) बाल्टी भर रंग उड़ेल देते हैं। उठा कर पानी की टंकी में फेंक देते हैं। कुछ मौका परस्त लोग तो इस त्योहार के बहाने और भी कई तरह के फायदे उठा लेने में ...

रेखाचित्र : दीपक बिन ज्योति

"मुझे आपकी आवाज अच्छी लगती है।" 'सच?' "तब क्या, झूठ बोलूँगा?" 'मैंने ऐसा तो नहीं कहा...। अच्छा! बताओ, मैं दिखती कैसी हूँ?' "दिखती कैसी हैं...., ये मुझे क्या पता?" "अरे...! पता कैसे नहीं? साल भर में एक दिन भी ऐसा नहीं रहा कि तुम मेरी कक्षा में उपस्थित न रहे हो। बिलकुल पहली बेंच पर बैठ कर सारे लेक्चर सुनते रहे हो तो मैं कैसे मान लूँ कि तुम्हें नहीं पता। चलो बताओ। कुछ तो कल्पना की होगी तुमने! वही बता दो।" अब तक उसके उसके विषय में मैंने उतना ही जाना जितना कि मेरी आँखों ने देखा था किंतु उसका आकलन और उसकी मासूम कल्पनाएँ मेरी कल्पनाओं से परे की वस्तु थी। उसी कपोल - कल्पना को जानने की बालसुलभ जिज्ञासा उस दिन सहज ही मेरे मन में जागृत हो उठी। प्रथम वर्ष बी. ए. की कक्षा का वह आखरी दिन था। वार्षिक परीक्षा का समय लगभग करीब आ चुका था। छमाही परीक्षा में उसने छियासी प्रतिशत अंक प्राप्त किये थे। अध्ययन के प्रति उस उन्नीस वर्षीय दृष्टिहीन बालक की तन्मयता ने मुझे काफी प्रभावित कर दिया था। इस बीच वो हम सब में काफी घुल मिल भी गया था। उस दिन ...

विचार : जनसंस्कृति और जनचेतना

ये उन दिनों की बात है। जब गली - गली दौड़ते थे। माँ जब भी दुकान भेजती ; एक पैर जमीन पर पटक कर ओठों को झनझनाकर मोटर की आवाज निकालते और अपने दो पैरों की गाड़ी स्टार्ट कर तेजी से निकल पड़ते। अपनी गाड़ी सीधे नुक्कड़ के पंसारी की दुकान पर जा कर ठहरती। फिर दुकान से जो स्टार्ट होती तो सीधे घर। चलना तो जैसे जानते ही नहीं थे। दौड़ने में जाने कौन सा रोब महसूस होता। दौड़ने के कई तरीके आते थे। कभी - कभी एक-एक पैर उछालकर घोड़े की चाल से दौड़ते। रबड़ में बँधे मेरे लंबे चमकीले - सुनहले बाल पीठ पर इधर- उधर होते तो धूप में अपनी ही परछाई देख मुझे बहुत अच्छा लगता। जल्दबाजी में माँ को दरवाजे से सामान पकड़ाती और इसके पहले कि माँ कोई दूसरा काम कहती मेरी गाड़ी गली के आगे अगले छोर तक पहुँच जाती। तब चप्पल पहनना गति में अवरोध मालूम देता। जब से चप्पल पहनने का सऊर आया। गली-गली दौड़ना छूट गया। जब शहर में गणपति बप्पा आते हैं तो बचपन की यादें साथ ले आते हैं। हम सब बच्चे सुबह-दोपहर-शाम नियम से कभी इस पंडाल तो कभी उस पंडाल में खड़े होकर ताली पीट-पीट कर आरती गाते। ख़ूब रामदाने बटोरते और खाते। चम्मच गोटी और दौड़ में हिस्सा लेते। ...

कविता : मीटू छोटी बच्चियों का हस्तक्षेप

मीटू एक हस्तक्षेप छोटी बच्चियों की ओर से भी; जिससे बड़े अंजान रहे - गुड़िया, रिंकी, पिंकी गली में खेलती लंगड़ी तीसरे नंबर वाले मकान से वे बराबर रखतीं दूरी उसमें रहने वाले दद्दा उन्हें बरामदे में बुलाते इधर - उधर की बात पूछते फिर मुँह पर जबरन बदबूदार मुँह धरते। लड़कियाँ बड़ों से कहतीं दद्दा बहुत गंदे हैं बड़े हँस कर समझाते - 'गंदी बात बेटा। बड़ों के लिए ऐसा नहीं कहते हैं' ------------------------- चींकी मिंकी की मम्मी कामों में उलझी रहतीं बच्ची को दुलार के कहतीं जाओं मुन्नी नई फ्रॉक का नाप दे आओ। दर्जी वाले भैया फ्रॉक उठा - उठाकर बड़ी देर नाप लेते गोटीनुमा उभारों को छूते-दबाते और कहते मुन्नी कल फिर अकेली आना नई फ्रॉक पहनाकर देखेंगे एक बार फिर अच्छे से नाप लेंगे और बढ़ियाँ सी फ्रॉक सी देंगे। ------------------------- चपरासी अंकल गुड़िया से अक्सर बतियाते मेरी प्यारी गुड़िया तू मुझे ख़ूब भाती है गुड़िया भी दद्दा से ख़ूब बतियाती है किसी दिन दद्दा कोने में ले जाकर मुँह पर गंदी वाली लार छुआते गुड़िया माँ के आँचल में दुबक जाती ख़ूब रोती स्कूल नहीं जाती दादी त...

विचार : भाषा बहता नीर

हम एक नये समय के बुद्धिजीवी हैं। हमारे बोलचाल और व्यवहार का संसार दिन ब दिन व्यापक होता जा रहा है। पिछले कुछ सालों में हमारी भाषा में घुसपैठिये किस्म के शब्दों की भरमार हो रही है। हमारी भाषा में इनकी पैठ इतनी तगड़ी है कि इनके प्रयोग बिना हमारा काम चलना भी मुश्किल हो गया है। इसी मिश्रित भाषा में हम अपने विचार, उद्देश्य, अनुभव, सूचनाओं और मनोभावों को एक दूसरे तक पहुँचा रहे हैं। हमारे आपसी सारे संबंध इसी भाषा में बन रहे हैं। इस संदर्भ में उत्तर आधुनिक विद्वान यहाँ तक कह रहे हैं कि भाषा के बाहर कुछ भी नहीं। उनकी दृष्टि में ‘भाषा‘ का अर्थ बहुत व्यापक है और ये सच भी तो है। वैदिक काल से आज तक भाषा रूपी नदी का जल कितने घाटों से होता हुआ हम तक आया है। समय के साथ उसमें कितनी मिलावट होती रही है। जितने नये शब्द, उन शब्दों के साथ उतनी ही नई अभिव्यक्तियाँ जुड़ी हैं। मानव सभ्यता और संस्कृति का इतिहास हमारे बोध में ऐसे अनेक शब्दों के जुड़ने अथवा उनकी विविध अर्थ छटाओं के अध्ययन का इतिहास है। मैं कई बार शब्दों के अनियंत्रित मेल से चकित हो जाती हूँ। पिछले कुछ दशकों के भीतर जाने कितने नये शब्द हमारी ज़ुब...

विचार : महानगरों में बचपन

और बालसाहित्य इतिहास हो गया ये उन दिनों की बात थी जब भारतीय बालमन Generation 'X' (1960-1980) बालसाहित्य में रमता था। उन दिनों 'पराग' (TOI), 'नंदन' (HT), 'मनमोहन' (मित्र प्रकाशन), 'राजा भैया' (आत्माराम एन्ड सन्स) 'चंदामामा' और 'लोटपोट' जैसी बालपत्रिकाएँ बालकों के बीच कुतूहल का विषय हुआ करती थीं। टेलीविजन क्रांति के साथ आये 'टॉम एंड जेरी' शो ने generation 'Y' (1980 - 2000) के हाथों से बची - कुची कॉमिक्स (किताब) भी छीन ली। इलेक्ट्रॉनिक पर्दे पर उछल कूद मचाने वाले 'स्पाइडरमैन', 'सुपरमैन' और 'रोबोर्ट' जैसे चमत्कारी देव इस पीढ़ी के बच्चों के दिलों पर राज करने लगे। जादुई पिटारे की इसी धूम धड़ाके के बीच generation 'Z' (2000 - अबतक) की पीढ़ी ने आँखें खोली। इस समय तक केबल नेटवर्क के जरिये भारत में परोसे जाने वाले चैनलों ने पुराने बाल साहित्य को कॉर्टून सिरियल्स (मोगली) में तब्दील कर दिया। जिसके चलते छोटे-छोटे बच्चे टीवी चलाये जाने के साथ ही ब्रश करने और दूध पीने का हट करना सीख गए। कार्टून क...

रिपोर्ट : साहित्यकारों के साथ एक शाम

अपने समय के कितने साहित्यकारों से हम परिचित हैं? अपने कितने समकालीनों से घंटों बैठ कर हमने बातें की हैं? उनमें से कितने हमारे करीबी मित्र बने हैं? हमने अपने अलावा और किस - किस को पढ़ा है, किस - किस के साहित्य पर खुल के चर्चाएँ की हैं? इन सवालों ने मुझे कल इतना उद्वेलित किया कि पवई से लौटते हुए कांजुरमार्ग से मैंने कौन सी ट्रेन ली, रात सवा दस बजे स्टेशन के बाहर लंबी लाइन में लगकर कुल कितने मिनट ऑटो का इंतजार किया। इन बातों का मुझे ध्यान ही नहीं रहा। कल शाम कथाकार मधु काँकरिया जी के घर आदरणीय कवि राजेश जोशी जी, विजयकुमार जी, अनूप सेठी जी की आत्मीय बैठक में सत्तर के दशक के नवोदित (अब प्रसिद्ध) कवियों - कथाकारों के व्यक्तित्त्व और उनकी रचनों की इतनी अलिखित दास्तानें सुनी जिन्हें अब तक के अध्यापकीय अनुभव में न किसी मंच पर सुना था और न ही कभी जाना। शीर्ष के साहित्यकारों के बीच श्रोता बनकर चार - पाँच घंटे की गपशप में मैंने जाना कि हमारे वरिष्ठ साहित्यकारों के बीच किस प्रकार के मैत्री संबंध रहे? ये जान कर ताज्जुब हुआ कि वे जब जिस शहर पहुँचे उस शहर के साहित्यकारों ने हृदय से एक दूसरे का स्व...

विचार : धर्म, धंधा और गाय

आजकल हरे मटर का सीज़न चल रहा है। घर - घर निमोना, घुघुरी बन रही है। स्टफ़ पराठों में भी मटर की पूड़ियाँ पूछी जा रही है। गाँव तो गाँव शहरों में भी हर हर दो दिन में पाँच - पाँच किलो छिम्मी छील - छील कर अगले चार - छः महीनों के लिए फ़्रिज में स्टोर किये जाने का कार्यक्रम जोरों पर चल रहा है। छिम्मी छीलते - छीलते माँ को अक्सर गाँव की याद हो आती है। माँ बताती हैं कि गाँवों में छिम्मी के छिलके पशुओं की हौदी में डाल दिए जाते हैं। सानी - पानी के साथ मिले कोमल छिलके द्वार पर बँधे पशु बड़े चाव से खा लिया करते हैं। यहाँ शहरों में तो कूड़ा भी गीला कचरा - सूखा कचरा के चक्रव्यूह में फँसा हुआ है और ऐसे ही कुचक्रों में उलझी है मंदिरों के बाहर किराये पर बँधी गाय। शहरों में बैल और भैंस तो दुर्लभ जीव हैं किंतु धर्म और धंधे के खूँटे में बँधी गाय यदा - कदा मंदिर, उद्यान, ओपन जिम या वाकिंग एरिया के आस - पास सहज ही देखने को मिल जाती है। गायों को इन जगहों तक पहुँचाने की सुविधा इसलिए ताकि वार के नाम पर आप दौड़ लगाते - लगाते या व्यायाम करके घर निकलते दान - धर्म करते हुए जाएँ वर्ना ऑफिस टाइम पर कहाँ आपको गाय को चारा ...

विचार : वस्तु, विज्ञापन और धोखा

संध्या को कहाँ पता था कि डायपर में लिपटा उसका दस माह का शिशु चैन की नहीं, मौत की नींद की ओर बढ़ रहा है। वह आदतन उसे डायपर पहनाकर ऑफिस चली जाती। शाम को घर लौटते ही उसे बदल देती। सोने से पहले फिर नयी डायपर बाँध कर दोनों की नींद के लिए निश्चिन्त हो जाती। कल सारी रात वह चिढ़ - चिढ़ाता रहा। नींद किसी की नहीं हो पायी थी। एक पल उसे लगा कि आज उसे घर पर ठहर जाना चाहिए।  'जिस दिन कुछ जरूरी काम हो उस दिन तुम्हारा बच्चा बीमार हो जाता है' मशीनी सभ्यता का यह हृदयहीन संवाद कमोबेश उसे काम पर खींच ले गया फिर आज पति ने छुट्टी ले ली है वे घर पर ऑनलाइन रहकर अपना काम मैनेज लेंगे और उसे देख भी लेंगे यह सोच कर वह निकल पड़ी। घन्टों बाद भी बच्चा नहीं जगा, रवि को चिंता हुई। उसने झटपट डॉक्टर की अपॉइन्मेंट ली और उसे लेकर हॉस्पिटल पहुँचा। स्थिति नाजुक बताते हुए डॉक्टर ने तुरंत शिशु को एडमिट कर लिया। कुछ ही देर बाद सन्ध्या को पता चला कि उसका बच्चा इस दुनिया में नहीं रहा। डॉक्टर ने बताया कि डिसेन्ट्री में उसके शरीर का सारा पानी निकल गया है। चार सालों की डॉक्टरी दौड़ के बाद मिली संतान वाले इस नये नवेले माँ -...

रिपोर्ट : साहित्यकारों का आत्मीय मिलन और पीढ़ियों के सुसंवाद

इन दिनों मुंबई में आदरणीय नरेंद्र मोहन जी की उपस्थिति और संयोग से कश्मीरी कवि अग्निशेखर जी के मिल जाने से कल ठाकुर विलेज के 'हाई ऑन टी' कॉर्नर में चाय पर चर्चा का छोटा- सा एक कार्यक्रम बन गया। पिछले शनिवार मुंबई, माटुंगा के मैसूर एसोसिएशन सभागार में मंटों पर हुए एक कार्यक्रम में आदरणीय डॉ. नरेंद्र मोहन जी मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। 'मंटो की जीवनी' और उनके रचनात्मक अनुभवों को उनसे सुनना हमारी कल की चर्चा का केंद्रीय विषय रहा। बात मंटो से शुरू हो कर सांप्रदायिक परिस्थियों से होते हुए विभाजन की त्रासदी तक गयी और बातों ही बातों में कश्मीर विस्थापन और आर्टिकल 370 के गंभीर समस्याओं तक विस्तार लेती चली गयी। अग्निशेखर जी ने कश्मीर से हिंदुओं के विस्थापन की त्रासदी का खुल कर वर्णन किया। उन्होंने बताया कि हिन्दू जो कश्मीर में अल्पसंख्यक हैं उन्हें लोग अल्पसंख्यक मानने को तैयार नहीं। विस्थापन के तीस वर्षों बाद आज का जम्मू पूरी तरह से वृद्धाश्रम में परिवर्तित होता जा रहा है। सालों से वहाँ के युवाओं के लिए रोजगार के एक भी अवसर उपलब्ध नहीं कराये गए। ऐसे में कश्मीर छोड़ ...

आलेख : महानगरों में बसंत को हाथ पकड़कर लाना पड़ता है

आजकल हम बड़े जल्दी बोर होने लगते हैं। दस मिनट की यात्रा में मन का साथी साथ न रहा तो बोर, रेस्टोरेंट में पसंदीदा टेबल न मिला तो खाना खाने में बोर, जूते मिल गए पर समय पर मोज़े न मिले तो ऑफिस जाने में बोर, हद तो तब हो जाती है जब सिनेमा हॉल बैठे - बैठे, मॉल में घूमते - घूमते और शादी- पार्टी के माहौल में हर इंसान की मुस्कान से मुस्कान मिलाते हुए भी हमें बोरियत महसूस होने लगे। एक समय था जब छोटी - छोटी बातें खुश कर जाया करती थीं आज एक क्लिक पर उपब्लध मनचाही चीजों का अंबार भी हमें बोर कर देता है। बच्चे हों या बड़े? कब कौन - सा सवाल किसका मूड ख़राब कर जाये, कह पाना मुश्किल है। आवश्यकता से अधिक पूछा गया एक अतिरिक्त सवाल भी झुँझलाहट पैदा कर देता है। ऐसे में व्यक्ति या तो उत्तर देता ही नहीं या फिर सीधे कह देता है कि 'वह बोर हो रहा है।' इसी बोरियत को इक्कीसवीं सदी ने 'पकाउ' जैसे विशेष शब्द में व्याख्यायित किया है। यह शब्द इस पीढ़ी के लोगों में विशेष कर बच्चों में बहुत अधिक प्रचलित है। इस सदी के नवांकुर बात - बात में पकने लगे हैं और रह - रह कर वस्तुओं एवं व्यक्तियों को पकाऊ होने की उप...

कहानी : अंतहीन

'स्वच्छ शहर, सुंदर शहर' की तलछट में जमी काई की कमाई से मिले रोग और मौत की कहानी है - 'अंतहीन'। आखिर, मशीनी सभ्यता वाले इन ऊँचे शहरों को नारकीय नालों में उतरने के लिए आदमी ही क्यों चाहिए? आप भी पढ़ें.... 'अंतहीन' "इस शहर में आदमी भी कचरे का माफिक बढ़ गया है। जिन्दा को रखने का जगह नहीं..., लाश को किधर रखेगा? ले के जाओ इसको इधर से।" कर्कश सी आवाज में बर्दाश न कर पाने वाले शब्दों को सुन लेने के बाद एक पल के लिए भी वहाँ ठहरने का कोई मतलब नहीं था। मुँह पर रुमाल बाँधकर भन्नाते, सूखे काठ से शव को कचरे की गाड़ी में डाल वह उसे घर ले आया था। झोपड़े के बाहर रखते ही सुरु दहाड़े मार कर रो पड़ी थी। "आई ग...sssss अ ग आई....sssss" अभी घंटे भर पहले ही तो उसे देखकर लौटी थी। बोल नहीं पा रहा था किंतु साँसें चल रही थीं। बोल तो वो पिछले पंद्रह दिनों नहीं रहा था जब से वह उसे अस्पताल में डाल कर आयी थी। दबे पाँव आयी मौत पति के साथ उसकी पूरी दुनिया ग्रस ले गयी थी। सुरु को विक्षिप्त अवस्था देख सोनू थर्रा उठा था। उसकी गोद में चढ़ कर बार - बार "आई..., आई..., बाबा को...

डायरी : एक प्राध्यापक की डायरी (पृष्ठ - 3)

वे भी क्या दिन थे जब विश्विद्यालयों में युवक - युवतियों के बीच संकोच की एक अदृश्य सी दीवार दुश्मन बने बैठी थी। साथ उठना - बैठना तो दूर पब्लिक प्लेस पर नजर उठा के देख लेना भी सपन सा था। आते - जाते नैना लड़ जाने, मीठी मुस्कान का आदान - प्रदान हो जाने भर से कइयों की धड़कनें तेज हो जाया करतीं। लड़कियाँ खुश थी कि उन्हें कॉलेज जाने और पढ़ने की आजादी मिली है। वे नियमित कक्षा में बैठकर सारे लेक्चर्स अटेंड करतीं। कॉलेज के प्रति लड़कों की इमानदारी भी देखने योग्य थी। खूबसूरत लड़कियों को बेरोक - टोक चार घंटे निहारने की कक्षा से अच्छी जगह भला और क्या हो सकती थी। कुलमिलाकर पहले लेक्चर से अंतिम लेक्चर तक कक्षा में सब का मन लगा रहता। बेचारे प्राध्यापक भरी क्लास देख कर इस भ्रम में खुश हो जाया करते कि विद्यार्थियों को उनकी कक्षा में रूचि है। ख़ुशी के मारे कई बार वे घंटे से एक्स्ट्रा पढ़ा दिया करते। कुछ की ख़ुशी इतने चरम पर होती कि वे पूरा लेक्चर ही लड़कियों की ओर देख कर पढ़ा देते। बेचारे लड़के...! क्या दिन थे वे...! प्राध्यापक पढ़ा के खुश, कुशाग्र विद्यार्थी सवाल - जवाब (active participation) से भरी क्लास...

डायरी : एक प्राध्यापक की डायरी (पृष्ठ - २)

'दिवाली आ रही है घर की सफाई कब होगी?' पिछले कुछ दिनों से ये सवाल कई बार पूछा जा चुका था। परीक्षा ड्यूटी, जाँच कार्य, रचनात्मक लेखन के साथ कहीं न कहीं आने-जाने की व्यस्तता में एक-एक दिन बीता जा रहा था। छुट्टी पड़े तो मैं भी मदद करूँ सोचते हुए वर्किंग डेज़ निकलते जा रहे थे। पिछले दो दिनों से कॉलेज से यूनिवर्सिटी, युविनर्सिटी से चर्चगेट और फिर वहीं से प्रकाशक के यहाँ चक्कर लगाने में एकदम थक गयी। दोनों दिन घर पहुँचने में लगभग रात के नौ- दस बजे। रविवार के दिन थके हुए तन के साथ बेचारा मन भी पूरे दिन चुपचाप पड़ा रहा। आज सुबह तैयार हो कर निकलने लगी तो माँ बोली, 'अब, आज कहाँ?' 'कॉलेज जा रही हूँ।' 'कॉलेज अभी बंद नहीं हुआ?' 'नहीं। आज आखरी दिन है। कल से छुट्टी।' 'ठीक है। जल्दी आ जाना। आज लड्डू बनाना है।' 'लड्डू...?' लड्डुओं का नंबर तो सफाई के बाद आता है न? सफाई पूरी हो गयी क्या? पूछने में कोई हर्ज नहीं था पर पूछना खतरे से खाली भी नहीं था। ज्यादा कुछ नहीं निकलने से पहले माँ द्वारा एक जोरदार लेक्चर मिल जाता! लड्डुओं ने जाहिर कर दिया था...

डायरी : एक प्राध्यापक की डायरी (पृष्ठ -१)

याद नहीं कि कभी किसी प्राध्यापक की डायरी सरेआम हुई हो! प्राध्यापक बड़ा सतर्क जीव होता है अपने ठाट - बाट से लेकर अपने काम- काज तक बिलकुल फाउंटेन पेन सा ख़ास। अपनी निजी डायरी के पन्ने वह कभी सार्वजनिक नहीं कर सकता। फिर भी, अपनी डायरी के कुछ पन्ने प्रस्तुत कर रही हूँ - लगातार चार लेक्चर लेने के बाद (120 युवाओं से भरी क्लास में लगातार चार घंटे बोलने के बाद) फेफड़ों से लेकर पेट की अंतड़ियाँ तक जबाव दे गयी थी। छोटे बच्चों को वर्ण उच्चारण में कितनी मेहनत लगती होगी इसका दर्द प्राध्यापक से बेहतर कौन समझ सकता है। पानी पी-पी कर बोलते रहने के बाद भी गला सूख कर काँटे की तरह चुभने लगा था। मुँह से एक शब्द निकालना स्वरतंत्र निकाल कर रख देने जैसा दर्ददायी लगने लगा। चौथी बेल हो चुकी थी। मेरे प्राध्यापकीय जीवन के सबसे सन्तोषजनक क्षण इसी बेल के बाद समाप्त हो जाया करते हैं। इसके बाद दिन की गाड़ी दूसरे गेयर में पहुँच जाती है। दो फ्लोर चढ़कर ऊपर स्टाफ रूम की ओर पहुँची कि दरवाजे पर 2-3 विद्यार्थियों ने घेर लिया। पिछले कई दिनों से कक्षा में रिसर्च प्रोजेक्ट का मार्गदर्शन कर रही थी और ये हैं कि एक दिन भी उपस्...

संस्मरण : श्याम सलोना प्यार

किशोरावस्था प्रेम और आकर्षण के लिए यूँ ही बदनाम नहीं है। इस उम्र ने कईयों को ठगा है। उन दिनों दूरदर्शन पर रामानंद सागर कृत 'श्री कृष्णा' सीरियल आता था। सन्डे की सुबह कुछ लोग नियमित हमारे घर टीवी देखने पहुँच जाया करते उनके कारण हमें भी जल्द ही उठकर बिस्तर समेटकर टीवी के सामने बैठना पड़ता था। देवकी - वसुदेव की विवशता, कंस की नाटकीयता, यशोदा की ममता, ग्वालिनों की वाक्पटुता मेरे मन में सीरियल के प्रति रूचि बढ़ाने लगी। हर सन्डे बालक कृष्ण का एक-एक असुर को मारते जाना बड़ा मजेदार लगता। कृष्ण लीलाएँ हर सन्डे आगे बढ़ती रहीं। गाय चराने, गोपियों को रिझाने, बाँसुरी बजा कर राधा को बुलाने वाले किशोर नायक ने सीरियल से निकलकर मेरे मन को कब लुभा लिया पता ही नहीं चला। रही सही कसर उनकी वंशी की धुन ने पूरी कर दी। बैकग्राउंड में बजने वाला वेणुगीत धीरे - धीरे भीतर तक समाने लगा। कृष्ण के बाँसुरी की मादक धुन हृदय के आर पार बिंध गयी। मैं विकल हो कर कृष्णलीला का इंतजार करने लगी। आने वाला हर सन्डे मेरे हृदय की पीड़ा बढ़ाने लगा था। उस वर्ष जन्माष्टमी के दिन मैंने व्रत रखने का निश्चय किया। व्रत रखा और वो ...

विचार : पूँजी, पद, पदोन्नति से राजनीति तक

उत्तरआधुनिक काल पूँजी के बल पर चीजों के इस्तेमाल का काल है। यह आधुनिकतावाद के कहीं आगे का काल है। इस काल में वस्तुओं के साथ व्यक्ति के 'यूज़ एन्ड थ्रो' की नई संस्कृति ने जन्म लिया। भारत जैसे बहुसांस्कृतिक देश में पूँजी के बल पर सर्वोच्च स्थान पर राज करने वाली इस संस्कृति को हम 'कॉर्पोरेट कल्चर' के नाम से जानते हैं। यह एक अमूर्त व्यवस्था है इसका प्रभाव परिवार से राजनीति तक देखा जा सकता है। सामाजिक संबंधों का वस्तुकरण (commodification) कर देना ही इस संस्कृति का मुख्य उद्देश्य है। हमारे देश में सत्ता तक पहुँचने के लिए विद्या और बुद्धिबल से अधिक धनबल का महत्त्व है। जो जितनी अधिक पूँजी जुटा पाता है वो उतना अधिक योग्य माना जाता है। योग्यता की इसी प्रक्रिया में व्यक्ति पूँजी की ओर झुकता है। पूँजी मीडिया को साधन बनाती है और व्यक्ति के जरिये सत्ता तक पहुँचती है। यही पूँजी अपनी नीतियों से कर्जदार को कर्जमुक्त कराती है और कर्जमुक्त को कर्जदार बनाती है। अब तक जिसने भी इनकी शर्तें स्वीकार की वे मठाधीश हुए जो इनसे अलग - थलग रहे वो शो पीस हुए। (या ये कहिये कि इस्तेमाल करके फेंक दि...

यात्रावृतांत - 'मंटो के जीते जागते अफ़सानों की बम्बई'

कौन कहता है कि बीती सदी के साथ वो पुराना समय बीत गया। शहर के सीने में किसी रहस्य सा दबा अपने जीवन की साँझ को बूढ़ी आँखों से देखता मैला - कुचला सा वो पुराना शहर आज भी इस महानगर के भीतर जीवित है। कैनेडी ब्रिज के उस ओर चमचमाती नई इमारतें इस ओर पुरानी दुमंजली चालें जिनकी खिड़कियों से मुजरे वालियाँ अपने  सजीले रूप की झल्कियाँ दिखा कर अपने ग्राहकों को लुभातीं और ऊपर ब्रिज पर खड़े लोग इन गलियों में गहराती शामों के साक्षी बनते। उन दिनों इन कोठों पर घुंघरुओं की छमक जितनी सघन होती इस समय संगीत मंडल की यह गली उतनी ही शांत और उदास सी दिखी। छप्परों पर बारिश की नाचती हुई बूंदें अपनी रिमझिमाहट से इतिहास में बजते घुँघुरुओं की प्रतिध्वनि सुनाने का प्रयास कर रही थी। जिस गली में मुस्तैद दलाल ग्राहकों के अलावा किसी को भीतर जाने न देते उस गली में प्रवेश कर पाना आज बेहद सहज था। हम गली से होते हुए पिछवाड़े आँगन की ओर गए। जहाँ सौ साल पुरानी दरगाह से उड़ती हुई धूप-बत्ती की सुगंध भीगे मौसम को और भी खुश्बूदार बना रही थी। हम देर तक बड़े मियाँ से दरगाह के विषय में पूछते रहे। पार्श्व में बिना किसी ध्वनि के तबले औ...

संस्मरण : 'रात अकेली और मैं'

लगभग पूरा वेटिंग रूम खाली हो चुका था। अब तक न जाने कितने परिवार आये और अपनी ट्रेन के आने के साथ ही चले गए। एक मैं ही थी जो पिछले सात घंटे से अंजाने शहर के अंजाने स्टेशन पर अकेली बैठी अपनी ट्रेन की प्रतीक्षा कर रही थी। सामने बैठा एक यात्री जाने कब से मुझे घूर रहा था। मैंने यह दर्शाने की भरसक कोशिश की कि उनकी इस दृष्टि का मुझ पर कोई असर नहीं पड़ रहा जबकि ठंड और डर के मारे मेरे पैर सुन्न पड़ रहे थे। जनवरी का महीना था। रात का तापमान दस डिग्री सेल्सियस के नीचे पहुँच चुका था। मैं नहीं चाहती थी कि मेरी भाषा - शब्द और उच्चारण की शैली इस शहर में मेरे अजनबी होने का राज़ खोले। मैंने चुप रहने में भलाई समझी। इसके अलावा मेरे पास कोई चारा भी नहीं था। इस समय मैं अपने शहर से सैकड़ों किलोमीटर दूर हरियाणा के अंबाला कैंट स्टेशन पर रात एक बजे अकेली बैठी एक अप्रत्याशित यात्रा का हिस्सा बन रही थी। ऐसा नहीं कि ये मेरी पहली यात्रा थी। इससे पहले भी मैंने कई बार मुंबई से दिल्ली, बनारस (और चंडीगढ़ पहुँचने तक की) अकेली यात्राएँ की थी किंतु इसबार की यात्रा मुझे इसप्रकार असहाय बना देगी इसकी मैंने कभी कल्पना भी न...

संस्मरण : पीले फूल कनेर के...

    अँधेरा हो चुका था। सड़कों की भीड़ गायब हो चुकी थी। घड़ी पर नज़र पड़ी। सवा आठ बज चुके थे। किसी अनजाने शहर में शाम के आठ के बाद का समय भी एक अनजाने भय का कारण बन जाता है। शाम चार बजे जिस रिक्शे से हम होटल से कनक भवन गए थे उसके चालक ने हमारी आपसी बातचीत से भाँप लिया था कि हम शहरी हैं और यहाँ दर्शन के लिए आये हैं। चलते समय दो सौ में लौटने तक की बात तय हुई थी किन्तु शाम तक बातें बना कर उसने जबरन चार सौ रूपये वसूल लिए। होटल से कनक भवन की दूरी तीन – चार किलोमीटर से ज्यादा की न थी। जन्मभूमि, दशरथ महल, कनक भवन और हनुमान गढ़ी ये सारे स्थल दो – तीन मिनट की पैदल दूरी पर आसपास ही स्थित हैं। अत: सारे दर्शन हम एक ही बार में पूर्ण कर चुके थे। लौटते समय रास्ते में तुलसीदास उद्यान व राम पैड़ी पर कुछ पल ठहर कर अंत में सरयु की आरती देखकर हम होटल निकल जाना चाहते थे। किन्तु वह जिद पर अड़ गया कि वह आरती होने तक नहीं रुकेगा। किराया ले कर वह तुरंत निकल जाना चाहता था। हम आज सुबह ही आये थे और कल ही हमें लौटना भी था इसलिए माँ इसी समय सरयु की आरती देख लेना चाहती थी। हमारा रुकना अनिवार्य था और उसे जान...

संस्मरण : बर्फ की सफेद चादर तले

आज के नवभारत टाइम्स, मुंबई के 'विधा विविधा' में मेरा #संस्मरण : बर्फ की सफेद चादर तले http://epaper.navbharattimes.com/details/5128-71351-1.html पीछे खेल के मैदान से आती हुई बच्चों की धीमी पड़ती आवाज लगभग गायब हो चुकी थी। शीत का असर सड़कों पर उतर आया था। नाविक अपनी नावों को किनारे कर रैन बसेरे की ओर बढ़ चले थे। ठिठुरती शीत की ढ़लती शाम की नीलिमा में दूर तक झिलमिलाती नैनीझील का रंग स्याह पड़ चुका था। झील किनारे बिखरे तमाम सैलानी तल्लीताल के होटलों में समा चुके थे। स्ट्रीट लाइट की मध्यम रोशनी में मैं देर तक ताल के  किनारे - किनारे उस स्थान को खोजती रही जहाँ उस दस वर्षीय गरीब पहाड़ी बालक की आत्मा ने निष्ठुर संसार से बिदाई ली थी। कल रात यहाँ बर्फ गिरी थी। बर्फ से उसका गहरा नाता था। वर्षों पूर्व ऐसी ही बर्फीली रात में वह भूखे पेट यहीं किसी बेंच पर सो गया था। उस रात वो ऐसा सोया कि फिर कभी नहीं उठा। उस कहानी को पढ़ने के बाद मैंने माना कि प्रकृति केवल स्त्रीलिंग शब्द ही नहीं उसमें माँ सी ममता भी है। वह अपने बच्चों को भूख से बिलखता नहीं देख पाती इसलिए जब अमीरों की दुनिया एक मासूम की छ...