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कविता - होने का सबूत

खोद कर जमीन  मिट्टी से पूछा क्या तुम इसी ज़मीन का हिस्सा हो? पहाड़ों को ढ़हा कर मलवों से भू - कम्प ने  माँगा अस्तित्व। पाट दिया गया प्रशांत भी हिंद की  पहली बूँद की ख़ातिर जला दिए गए जंगल वाज़िब सबूत की तलाश में शक में घिरी घटाएँ जो दे न पायीं  अपने आसमानों की गवाही। धरती इतनी बौखलायी पहले कभी न थी आसमानों ने कभी न बरसायी थीं चिंगारियाँ कभी राख न हुए थे इससे पहले  करोड़ों की संख्या में निर्दोष बेजुबाँ। यह एक दुःसह दुःस्वप्न था  जड़ - चेतन के अस्तित्व का प्रश्न था माँग लिया था किसी ने पृथ्वी से उसके होने का सबूत।

कविता : समय के पार कविता

एक भयानक कोलाहल चारों ओर  सैकड़ों लोग दौड़ते - भागते हाँफते पीछे चले आ रहे हैं पलट कर देखती हूँ तो सन्नाटा है इस कोने से उस कोने तक  कहीं कोई नहीं एम्बुलेंस की एक उड़ती हुई आवाज  चीखते हुए गुजर जाती है किनारे बैठे लोग काली चादर ओढ़े सो चुके हैं हजारों कदमों की धमक को एक बार में सह लेने वाला शहर का पुराना पुल  शवों के बोझ से थर्रा रहा है अस्पतालों के गलियारे पुल में बदल रहे हैं मौत किनारे - किनारे काली चादर ओढ़े सो रही है कुछ देखा - अनदेखा किये सैकड़ों लोग  दौड़ते - भागते - हाँफते एक दूसरे को धकियाते गलियारे से गुजरते जा रहे लोग चीखते पुकारते हटो..., हटो..,  थोड़ी सी जगह दो जल्दी करो, जाने दो मुझे मेरी साँस उखड़ रही है एक तीसरी निगाह भीड़ पर से उड़ कर गुजर जाती है शहर बेचैन हो उठता है टीवी खुली है खिड़कियाँ बंद हो चुकी हैं जगह - जगह धब्बे गहरे काले धब्बे दृश्यों के साथ उतरते जा रहे धब्बे आगे कुछ दिखाई नहीं दे रहा धब्बे घुप्प अँधेरे में बदल रहे हैं चारों ओर निराशा  मायूसी अकेलापन  बेचैनी घबराहट घुटन संक्रामक हो कर  ज़ेहन में फैल रही है लोग भाग रहे हैं अपनों...