कविता - होने का सबूत
खोद कर जमीन मिट्टी से पूछा क्या तुम इसी ज़मीन का हिस्सा हो? पहाड़ों को ढ़हा कर मलवों से भू - कम्प ने माँगा अस्तित्व। पाट दिया गया प्रशांत भी हिंद की पहली बूँद की ख़ातिर जला दिए गए जंगल वाज़िब सबूत की तलाश में शक में घिरी घटाएँ जो दे न पायीं अपने आसमानों की गवाही। धरती इतनी बौखलायी पहले कभी न थी आसमानों ने कभी न बरसायी थीं चिंगारियाँ कभी राख न हुए थे इससे पहले करोड़ों की संख्या में निर्दोष बेजुबाँ। यह एक दुःसह दुःस्वप्न था जड़ - चेतन के अस्तित्व का प्रश्न था माँग लिया था किसी ने पृथ्वी से उसके होने का सबूत।