संस्मरण : शहर में जंगल ( येऊर पहाड़ी की सैर)
ऊँची इमारतों से सजी दुनिया पीछे छोड़ बड़ी तेजी से बस येऊर पहाड़ी की ओर बढ़ चली। वही पहाड़ी जिसे अपने फ्लॅट की बालकनी से कई बार देखा करती। रात में पहाड़ी की घुमावदार सड़क पर चढ़ती - उतरती गाड़ियों की घुमावदार लाइट देखने में बड़ी प्यारी लगती थी। बचपन से आज तक ये पहाड़ी मेरे लिए आकर्षण का केंद्र बनी रही किंतु आज उस दिशा में जाते हुए हल्का सा भय लगने लगा था। बचपन में हम बच्चों की टोली कभी कभार इस ओर चली आती तो घर पहुँचने पर बड़ी डाँट पड़ती। हमें अक्सर चेताया जाता कि 'उपवन तलाव से सटी येऊर पहाड़ी पर आदिवासी रहते हैं वहाँ जाने वालों को कोयता घोंप कर मार डालते हैं।' बचपन में इन बातों से रूह काँप जाती थी। येऊर न सही पर उपवन तलाव हम कभी कभार चले ही जाया करते। एक दिन हमारी गली का एक लड़का खो गया। उस दिन बच्चों की टोली वहीं मोहल्ले में थी। अकेले उसी का कहीं अता - पता न था। उसके माँ - बाप उसे खोजते रोते - पीटते रहे। दो दिन बाद उसकी लाश इसी उपवन तलाव में पायी गयी थी। तब से कभी दोबारा उपवन तलाव की ओर जाने की हिम्मत नहीं हुई। पूस की ठंडी हवा बस की खिड़कियों से सरसराती हुई पूरे शरीर में सिहरन दौड़...