कहानी : अंतहीन

'स्वच्छ शहर, सुंदर शहर' की तलछट में जमी काई की कमाई से मिले रोग और मौत की कहानी है - 'अंतहीन'। आखिर, मशीनी सभ्यता वाले इन ऊँचे शहरों को नारकीय नालों में उतरने के लिए आदमी ही क्यों चाहिए? आप भी पढ़ें....

'अंतहीन'

"इस शहर में आदमी भी कचरे का माफिक बढ़ गया है। जिन्दा को रखने का जगह नहीं..., लाश को किधर रखेगा? ले के जाओ इसको इधर से।" कर्कश सी आवाज में बर्दाश न कर पाने वाले शब्दों को सुन लेने के बाद एक पल के लिए भी वहाँ ठहरने का कोई मतलब नहीं था। मुँह पर रुमाल बाँधकर भन्नाते, सूखे काठ से शव को कचरे की गाड़ी में डाल वह उसे घर ले आया था। झोपड़े के बाहर रखते ही सुरु दहाड़े मार कर रो पड़ी थी।
"आई ग...sssss अ ग आई....sssss"

अभी घंटे भर पहले ही तो उसे देखकर लौटी थी। बोल नहीं पा रहा था किंतु साँसें चल रही थीं। बोल तो वो पिछले पंद्रह दिनों नहीं रहा था जब से वह उसे अस्पताल में डाल कर आयी थी। दबे पाँव आयी मौत पति के साथ उसकी पूरी दुनिया ग्रस ले गयी थी। सुरु को विक्षिप्त अवस्था देख सोनू थर्रा उठा था। उसकी गोद में चढ़ कर बार - बार "आई..., आई..., बाबा को क्या हुआ? बाबा को क्या हुआ आई? पूछता जा रहा था। माँ से जवाब न पा कर नन्ही उँगलियों से उसके गालों को खुरचता, बाल खींचता, साड़ी पकड़कर उसे झिंझोड़ता और लगातार वही एक ही रट लगाये रहता। चार वर्ष के बच्चे के मासूम सवाल ने पड़ोसियों का कलेजा छलनी कर दिया। औरतें मुँह दबाकर भीतर ही भीतर घुट रही थीं। पुरुष अपना धीरज खो देने के डर से कुछ देर के लिए तितर-बितर हो गए थे। सोनू कभी माँ की गोद में चढ़ कर "आई..आई.." तो कभी पिता के शव से लिपट कर "बाबा...बाबा.." करता जा रहा था।

सुरु की चीत्कार से चव्हाण का कलेजा फटा जा रहा था। उसे लगा कि कचरू की मौत का जिम्मेदार वही है। सारी गलती उसी की है। उसी के कारण कचरू मारा गया। हाँ! वह इसे हत्या ही कहेगा। बिना सुरक्षा के कीचड़ से बजबजाते नाले में आदमी को उतरवाना उसकी हत्या करना नहीं तो और क्या है? शोक के माहौल में उसका दम घुटने लगा था। वह उलटे पाँव गली से बाहर निकल आया और सीधे चौराहे के वाचन कट्टे पर पहुँचकर फूट-फूट कर रोने लगा। तीन महीने पहले कचरू उसे यहीं मिला था। हाथ जोड़ कर नौकरी की गुहार कर रहा था।

सुजीत चव्हाण बृहन्मुम्बई महानगर पालिका के 'एफ' वार्ड में स्वच्छता विभाग का कर्मचारी है। अपने समाज के लोगों के बीच वह बड़ा अफसर बनता फिरता है। उसे अपनी सरकारी नौकरी पर बड़ा गुमान है। वह अक्सर लोगों से कहता, "मैं तुम लोगों की तरह दिन भर की मजदूरी नहीं करता। प्रति दिन ठाठ से कार्यालय जाकर रजिस्टर पर हस्ताक्षर करता हूँ और महीने की पहली तारीख को तनख्वा पा जाता हूँ।" दरअसल चव्हाण 'एफ' वार्ड में कचरा वाहक का चालक है। सुबह वार्ड में जाकर घनकचरा गाड़ी के आवक - जावक रजिस्टर पर हस्ताक्षर करना और गाड़ी ले कर किंग सर्कल इलाके से कचरा इकट्ठा कर डंपिंग ग्राउंग पर डाल आना उसकी रोज की ड्यूटी का हिस्सा है।

गायकवाड़ साहब की टेबल पर अक्सर ही ठेकेदार अतुल सोनावणे से उसकी भेंट हो जाया करती। सुधीर गायकवाड़ स्वच्छता विभाग के अधिकारी हैं। इस नाते इन सब के बॉस वहीं हैं। सुबह उन्हें सलाम ठोक कर काम पर निकलना चव्हाण की आदत बन चुकी थी। ‘एफ’ वार्ड के अंतर्गत आने वाले माटुंगा - दादर पूर्व के इलाकों के गटर-नालों की सफाई का कॉन्ट्रेक्ट साहब ने सोनावणे को दे रखा था। सोनावणे धारावी चौक से दिहाड़ी मजदूरों को उठाकर उन्हें काम पर ले जाया करता। उसका दिलाया काम इतना असुरक्षित और दुर्गन्ध भरा होता कि कुछ दिन में मजदूर बीमार पड़ जाते। कई तो एक दिन काम कर लेने के बाद दोबारा चलने को ही तैयार न होते। पिछले साल की बारिश में घटी घटना के कारण बीएमसी पर नाले और मेनहोल्स की सफाई का दबाव बढ़ गया था। काम जितना अधिक था कर्मचारी उतने कम। सड़क की सफाई का काम बीएमसी खुद देख लिया करती किंतु गटर सफाई का काम ठेके पर ही चलता। इस काम के लिए सोनावणे गायकवाड़ साहब से अच्छी खासी रकम पास करवाता किंतु मजदूरों को डेढ़ - दो सौ से अधिक न देता था। वह अक्सर ही चव्हाण से आदमी दिलाने की बात कहता। आदमी के बदले उसे दिन के पचास रूपये मुफ़्त दे दिया करता। कचरू को सोनावणे से उसी ने मिलवाया था।

"ये साहब लोग विकास के नाम पर बड़ी-बड़ी बात करता है। अक्खा शहर में सफाई अभियान चलाता फिरता है तो गटर साफ करने के लिए मशीन क्यों नहीं बनाता? मेनहोल का कचरा निकालने के लिए इनको साला आदमी ही क्यों चाहिए? कुर्सी पे बैठते ही ये लोग अपने लोगों का दर्द भूल जाता है। पाँच रूपये के मास्क के लिए दस टेबल पर घुमाता है। इनका रवैया देख कर बेचारा गरीब आदमी बिना मास्क के ही जान जोखिम में डाल कर नर्क में उतर जाता है।" कई दिनों से ये बातें उसके मन में घुमड़ रही थीं। आज आत्मग्लानी में चव्हाण सब कुछ उगलता जा रहा था।

"काय रे चव्हाण? वो प्रतिक्षा नगर का मेनलाइन चॉकअप ऐसे ही रहेगा क्या? कितना दिन से सोसायटी वालों का कम्प्लेन आ रहा है। वो तेरा कचरू तो काम से गया। मेनहोल में उतरने के लिए कोई दूसरा आदमी ला के दे ना!" सुबह ही 'एफ' वार्ड से गाड़ी ले कर निकलते समय सोनावणे उसे गेट पर मिल गया था। उसे सामने से अनसुना कर निकलते देख वह फिर बोल उठा था, "इतना भाव क्यों खाता है रे चव्हाण? पचास की जगह सौ ले लिया कर। चल, अब नया आदमी ला कर दे। इस काम के लिए साला जल्दी कोई मिलता भी नहीं है।"

पाँच साल पहले सुरु से विवाह कर वह उसे मुंबई ले आया था। उसकी जाति में साफ सुथरे रंग की लड़कियाँ मिलती ही कहाँ हैं? एक सुरु ही थी जिसपर बिरादरी के हर युवक की नजर थी। बड़ा ख़ुशनसीब मानता था वह खुद को कि सुरु ने उसका हाथ थामा था। थामती भी क्यों नहीं कचरू मुंबई में नौकरी जो करता था। धारावी में उसका अपना झोपड़ा था। अक्सर गाँव जा कर वह माता - पिता को देख आया करता। ऐसे ही किसी दिन उसका हाथ थामकर सुरु मुंबई चली आयी थी। कितनी खुशहाल जिंदगी थी। सबकुछ बड़ा अच्छा चल रहा था। कचरू धारावी में चमड़ा सफाई के एक कुटीर उद्योग में कार्यरत था। उनका बेटा सोनू चार साल का हो रहा था। सुरु फिर गर्भ से थी। कितने सपने संजोये थे उसने पत्नी और बच्चों को लेकर। इसी बीच सरकार ने धारावी में चमड़ा कटाई - धुलाई व्यवसाय पर बंदी लगा दी और एक दिन अचानक वह निराधार हो गया। काम की तलाश में दिन भर की ठोकरें खाने के बाद भी निराशा ही हाथ लगती। इस बीच सुरु 'जैन कॉलोनी' में बर्तन माँजकर अकस्मात आयी इस रिक्तता को भरने का प्रयास करने लगी।

एक दिन अचानक घर आकर वह फूट - फूट कर रोने लगी। उसे क्या पता था कि मालकिन आज घर पर नहीं है और मालिक इतना गिरा हुआ आदमी होगा कि उसके गर्भवती होने तक को अनदेखा कर देगा। गाँव की हर लालची निगाह से उसने खुद को बचाये रखा था किंतु शहर के सभ्य - सुसंस्कृत लोग इस हद तक जंगली होंगे इसकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी। उसे रोता देख कचरू उबल पड़ा था, "जाती ही क्यों हो ऐसे बेगैरतों के घर? मैं बेरोजगार जरूर हुआ हूँ लेकिन अभी मरा नहीं हूँ। कुछ भी करके मैं आज काम खोजकर रहूँगा। कल से तुम कहीं नहीं जाओगी। समझी?"

पहली बार उसने अपने पति को इतने गुस्से में देखा था। उसकी छोटी - छोटी आँखें लाल हो गयी थीं। दुबले - पतले शरीर में जाने कहाँ से इतना उबाल आ गया था। उसकी आवाज से डरकर सोनू सुरु के आँचल में दुबक गया था। कचरू ने ठान लिया कि आज कुछ भी करके वह सुजीत चव्हाण से मिल कर रहेगा। उसके इंतजार में कोलीवाड़े के कट्टे पर बैठकर देर तक वह जाने क्या - क्या बड़बड़ाता रहा।

महीने भर काम कर लेने के बाद ही कचरू का दम फूलने लगा था। यह जानकर सुरु के पैरों तले की जमीन खिसक गयी कि सफाई के नाम पर उसका कचरू मेनहोल में उतर कर शहर भर की काई काछता है। डॉक्टर ने बताया कि जिस प्रकार की चित्तियाँ उसके शरीर पर निकल आयीं हैं ठीक उसी प्रकार की भीतर भी उभर आयी हैं। ये साधारण खाज-खुजली नहीं बल्कि संक्रामक इन्फेक्शन है। जो उसकी फेफड़ों में अपनी जड़ें जमा चुका है।

दुनिया भर की गंदगी उसके फेफड़ों को भीतर ही भीतर खा रही थी। त्वचा पर अजीब से दिखने वाले फफोले कचरू को बेचैन कर देते थे। खुजली के साथ उनमें भयानक दर्द होने लगा था। सारी रात उसे नींद न आती। उसे लगता जैसे असंख्य कीड़े उसके शरीर से चिपक गए हैं और उसे नोंच - नोंच कर खा रहे हैं।

हर दो - पाँच दिन में उन्हें डॉक्टरी महकमे का चक्कर लगाना पड़ रहा था। सायन अस्पताल के बड़े से बड़े डॉक्टर ने उसे समझा दिया था कि जब तक वह यह काम नहीं छोड़ेगा तब तक ठीक नहीं हो पायेगा। सुरु ने कितनी बार कहा, "छोड़ क्यों नहीं देते ये काम। हम कुछ और कर लेंगे। न हो सका तो अपने गाँव ही लौट चलेंगे।" पति की बेचैनी उससे देखी नहीं जाती। कई बार तो वह व्यवस्था पर अपनी खीझ उतारती। दुनिया वालों को बुरा भला कहती जिसके कारण उसके पति की भली सी नौकरी छूट गयी थी। कचरू इस विषय में उससे कम ही बात करता किंतु कभी-कभी उसे शांत करने के लिए कह उठता, "सुरु, बाहर की दुनिया कितनी भी बुरी क्यों न हो किंतु उस नारकीय गड्ढे से कई गुना बेहतर है।"

सड़ांध मारते, काई और सीलन लगे, घने अँधरे कुएँ में वह जब भी उतरता तो उसे ऐसा लगता जैसे वह मौत के कुएँ में उतर रहा है। उसे लगता जैसे वह पाताल के नीचे नर्कलोक में पहुँच गया है। यहाँ पहुँचकर जीवन से जैसे उसका संपर्क टूट जाता। कुछ झुककर अंदाजे से नीचे के निकास मार्ग को तलाशकर वह हाथ से कीचड़ काछता तो गले तक पहुँचे काले पानी में उसे मौत की काली छाया नजर आने लगती। ऊपर से आतीं किरणों के सहारे बाहरी दुनिया में लौटने की उम्मीद लिए वह जल्दी-जल्दी हाथ चलता। उस हलचल से सड़ांध मारता पानी कभी उसके नाक तो कभी मुँह में घुस आता। कई बार ऑक्सीजन की कमी से भीतर उसका दम घुटने लगता। उसे बेसुध होते देख उसके साथी हाथ पकड़कर उसे बाहर खींच निकालते। कई बार बाहर निकाला गया कचरू काले कीचड़ के ढ़ेर के पास घंटों बेहोश पड़ा रहता। उस पर भी कभी सोनावणे उधर से गुजरता तो कह उठता, "क्या रे कचरू, ऐसे काम करेगा तो बाकी के नाले कब तक साफ करेगा?" बारिश के पहले ‘एफ’ वार्ड के नालों और गड्ढों की सफाई उसी के जिम्मे थी। नाले बहुत हैं और बारिश के आने में समय बहुत कम इसलिए उसे बेनागा रोज किसी न किसी मेनहोल में उतरना पड़ता था।

आज सुबह सुरु जब अस्पताल पहुँची तो कचरू की आँखें ऊपर को टंग गयी थीं। खुले मुँह के आस - पास मख्खियाँ भिनभिना रही थीं। जेठ की धूप बरामदे में सीधे उसके मुँह पर पड़ रही थी। पंद्रह दिन से बीमार पति को अस्पताल के बरामदे में पड़ा देख सुरु का कलेजा मुँह को आ जाता। कई बार उठकर वह पूछताछ खिड़की पर पति को भीतर वार्ड में डालने की बात कह आती। डेंगू - मलेरिया और टीबी के रोगी इतने बढ़ गए थे कि मरीजों को बेड अलॉट करना मुश्किल हो गया था। चौदह सौ बेड वाले सायन अस्पताल में बीमार पड़े कचरू को रोगियों को मिलने वाली सामान्य सी सुविधाएँ भी नसीब नहीं हो पा रही थीं।

दिनभर की दवाइयाँ नर्स सुबह ही पकड़ा जाती किंतु दवाइयों से पहले मुँह में कुछ डालना भी तो जरुरी है। मुँह में छाले होने के कारण कुछ ठोस खिलाना मुमकिन नहीं था। तीनों समय दाल का पानी पिलाकर कर वह उसके मुँह में दवाई की शीशी उड़ेल देती। उतनी देर के लिए वह इस कदर छटपटाता जैसे जले- कटे अंग पर किसी ने नमक-मिर्च का लेप मल दिया हो! घर में दाल का आखरी दाना भी समाप्त हो चुका था। पड़ोसियों ने इस बीच उसकी काफी मदद की किंतु इससे अधिक कुछ करने की उनकी भी औकात नहीं थी। सोनू को गोद में लेकर वह अस्पताल से घर के चक्कर लगाया करती। एक दिन नर्स ने ही झड़प दिया, "बच्चे को कायको लेकर आता है इधर?" तब से उसे पड़ोसियों के घर छोड़ आती। आठ माह का गर्भ लिए बार-बार चक्कर लगाना आसान नहीं था इसलिए सुबह आती और अँधेरा होने से पहले घर लौट जाती।

चव्हाण से कुछ पैसों की मदद माँगने के इरादे से आज वह अस्पताल से 'एफ' वार्ड पहुँची थी। चव्हाण वहीं गेट पर मिल गया। मदद के नाम पर उसका पारा चढ़ गया, "मैं किधर से देगा पैसा? एक तो उसे काम पे लगवाया। अभी पैसा भी मैं ही देने का?" सोनावणे के पास उसे टरकाकर वह गाड़ी ले कर निकल गया। अतुल सोनावणे वहीँ गायकवाड़ साहब के केबिन के बाहर चपरासी से बात करता मिल गया। कचरू का नाम सुनकर पहले तो उसने आना-कानी की। सुरु तब भी नहीं टली तो बोला, "मैं यहाँ ठेके पर काम करता हूँ। विभाग के अधिकारी गायकवाड़ साहब हैं। वही आपकी मदद कर सकते हैं।" कहते हुए उसने अपना पल्ला झाड़ लिया। आखरी उम्मीद लिए सुरु गायकवाड़ साहब के केबिन के बाहर खड़ी हो गयी। चपरासी ने बताया कि साहब केबिन में नहीं हैं। आज उन्हें आने में देरी भी हो सकती है। वह उसे कल फिर आने को कहता रहा किंतु कल फिर आने की हिम्मत उसमें कहाँ बची थी इसलिए वह वहीं केबिन के बाहर बैठ गयी।

दो घंटे बाद गायकवाड़ साहब आये भी तो सीधे कदम साहब के केबिन में घुस गए। फिर थोड़ी देर बाद दोनों बात करते हुए निकले और सामने लगी गाड़ी में जा कर बैठ गये। चपरासी को सुरु की लाचारी पर दया आ गयी थी, "साहब जा रहे हैं। जाओ जल्दी। जाके बोलो जो भी बोलना हो! नहीं तो निकल जायेंगे।" बैठे - बैठे उसके पैरों में सूजन चढ़ आयी थी। दुहरा भार लिए जल्दी चल पाना मुश्किल काम था। गेट तक पहुँचने से पहले ही गाड़ी निकल गयी। चौकीदार ने बताया कि साहब आम्बेडकर चौक पर बने पुतले पर माला चढाने गए हैं। आज वहाँ 'स्वच्छ मुंबर्इ, सुंदर मुंबई' अभियान का उद्घाटन होने वाला है।

थक हार कर वह कार्यालय से अस्पताल लौट आयी। आज का पूरा दिन भूखे ही निकल गया। पेट में पल रहा शिशु रह - रहकर मचल जाता। खंभे के सहारे निढाल पड़ी सुरु एक टक पति को देखती रही। अँधेरा होते देख भारी मन से पूरी हिम्मत जुटा कर उठी और कचरू के पास जा कर बैठ गयी फिर न जाने क्या सोचकर उसके चेहरे पर हौले से उँगलियाँ फेरी। उसके कान में धीरे से कल आने की बात कह कर उठी और घर की ओर चल पड़ी।

सुबह अपनी ही कही बात से दिन भर चव्हाण का मन जलता रहा। ड्यूटी से निकलकर आज पहली बार वह कचरू को देखने अस्पताल आया था। उसके पहुँचने से पहले सुरु जा चुकी थी। सुरु के जाने के कुछ ही देर बाद कचरू ने दम तोड़ दिया था।

डॉ. जयश्री सिंह, मुंबई

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