संस्मरण : शहर में जंगल ( येऊर पहाड़ी की सैर)
ऊँची इमारतों से सजी दुनिया पीछे छोड़ बड़ी तेजी से बस येऊर पहाड़ी की ओर बढ़ चली। वही पहाड़ी जिसे अपने फ्लॅट की बालकनी से कई बार देखा करती। रात में पहाड़ी की घुमावदार सड़क पर चढ़ती - उतरती गाड़ियों की घुमावदार लाइट देखने में बड़ी प्यारी लगती थी। बचपन से आज तक ये पहाड़ी मेरे लिए आकर्षण का केंद्र बनी रही किंतु आज उस दिशा में जाते हुए हल्का सा भय लगने लगा था। बचपन में हम बच्चों की टोली कभी कभार इस ओर चली आती तो घर पहुँचने पर बड़ी डाँट पड़ती। हमें अक्सर चेताया जाता कि 'उपवन तलाव से सटी येऊर पहाड़ी पर आदिवासी रहते हैं वहाँ जाने वालों को कोयता घोंप कर मार डालते हैं।' बचपन में इन बातों से रूह काँप जाती थी। येऊर न सही पर उपवन तलाव हम कभी कभार चले ही जाया करते। एक दिन हमारी गली का एक लड़का खो गया। उस दिन बच्चों की टोली वहीं मोहल्ले में थी। अकेले उसी का कहीं अता - पता न था। उसके माँ - बाप उसे खोजते रोते - पीटते रहे। दो दिन बाद उसकी लाश इसी उपवन तलाव में पायी गयी थी। तब से कभी दोबारा उपवन तलाव की ओर जाने की हिम्मत नहीं हुई। पूस की ठंडी हवा बस की खिड़कियों से सरसराती हुई पूरे शरीर में सिहरन दौड़ा गयी। आज बाईस वर्षों बाद मैं इस इलाके में आयी थी। बचपन की बातें आज भी मन से विस्मृत नहीं हुई थी। टीएमटी की छोटी सी बस तेजी से घुमावदार चक्कर काटती हुई ऊपर चढ़ती चली जा रही थी। मैं आस - पास के जंगल में भरमाकर मन को स्मृतियों से खींच लाने का प्रयास करने लगी। आज के दिन यहाँ पहुँचकर मैं अपने अतीत को नहीं बल्कि वर्तमान को जीना चाहती थी। मेरे लिए आज का दिन बेहद खास था। बचपन में जिन आदिवासियों के नाम से मेरी रूह काँप जाया करती थी आज उन्हीं के बुलावे पर पहली बार उनके साथ उनका गाँव और जंगल देखने जा रही थी।
सुना था येऊर की पहाड़ी अब उपवन की नई इमारतों के रहवासियों का जिम पॉइंट बन चुकी है यहाँ पिछले पंद्रह वर्षों में कई टावर बन चुके थे। कितना बदल गया था उपवन। यहाँ के नए लोग सुबह इन्हीं रास्तों पर चढ़ उतर कर कसरत की कसर पूरी कर लिया करते हैं। मैंने भी कभी नहीं सुना कि पिछले पंद्रह वर्षों में यहाँ कोई दुर्घटना घटी हो! हालाँकि इतने सालों में कभी इस ओर आने का मौका ही नहीं मिला। घर की बालकनी से दूर दिखती ये पहाड़ी अक्सर मुझे बुलाती रही। चंदा, शोभा और पल्लवी के आग्रह को आज मैं टाल न पायी थी। बड़ा ताज्जुब हुआ था ये जान कर कि मेरी बी. ए. हिन्दी कक्षा की ये तीनों छात्राएँ आदिवासी हैं। मेट्रोपोलिटन शहर के बीचों बीच ठाणे स्टेशन से सटे विशाल प्रांगण वाले कॉलेज में जहाँ ज्यादातर अच्छे घरों के युवा पढ़ते हैं वहाँ कक्षा में प्रतिदिन उपस्थित रहने वाली, भोलीभाली, शर्मीली, साँवली, संकोच से भरी हुई ये तीन लड़कियाँ सबके बीच अलग सी लगतीं। नीचे देखकर बात करने वाली इनकी आदत मुझे खल जाती। मैं कई बार सोचती – ‘कौन हैं ये लड़कियाँ? किस बैकग्राउंड से आती हैं? बात करते समय नजर क्यों नहीं मिलाती?’ एक दिन जिज्ञासावश पूछ लिया तो इनके गाँव, घर, जंगल के साथ - साथ येऊर की पहाड़ी का रहस्य खुलने लगा। मैंने अपने कानों को यकीन दिलाने के लिए फिर पूछा, "तुम सब येऊर पहाड़ी के ऊपर वाले गाँव में रहती हो?" उन्होंने सकुचाकर कहा, "हाँ! मिस, आइये न कभी हमारे गाँव।"
बस मिलिट्री कैंप से गुजरती हुई आगे येऊर गाँव में प्रवेश कर एक किनारे पर जा कर खड़ी हो गयी। यही इसका आखरी स्टॉप था। खिड़की से नीचे देखा चंदा, शोभा सामने खड़ी मुझे देख कर खुश हो रही थीं। 'अरे! मिस आप तो पहचान में नहीं आ रही हैं। जीन्स और शर्ट में बिलकुल कॉलेज की लड़की लग रही हैं!' बस से उतरते हुए मैंने कहा, 'तुम्हीं ने तो कहा था कि हमें जंगल में जाना है आप अच्छे कपड़े पहनकर न आना।' लड़कियों ने मुझे पहले से हिदायत दे दी थी कि मुझे उनके जैसी अतिसामान्य दिखना होगा। यदि रास्ते में अधिकारियों की गाड़ी मिल गयी तो वे मुझे जंगल में अंदर जाने नहीं देंगे। दरअसल लड़कियाँ मुझे गाँव के रास्ते पीछे की पहाड़ी के पीछे जंगल में उस झरने के पास ले जाना चाहती थीं जहाँ तक केवल गाँव के लोगों को ही जाने की इजाजत थी। येऊर पहाड़ी और उसके पीछे का इलाका वन विभाग और मिलिट्री कैम्प में आता था। जंगल में जंगली जानवरों का खतरा भी था इसलिए जंगल में आम लोगों का प्रवेश वर्जित था। गाँव के लोगों के अलावा उन रास्तों को कोई जानता भी न था। चंदा, शोभा और पल्लवी ने मुझे बताया था कि वे रोज शाम वहाँ घूमने जाती हैं और अँधेरा होने से पहले गाँव लौट आती हैं। उन्हीं की बातों से लुभाकर मैं भी प्रकृति को निकट से महसूस करने का सुख पाना चाहती थी इसलिए आज यहाँ आयी थी।
हम गाँव की गलियों से उनके पुराने प्राथमिक स्कूल के रास्ते पीछे की ओर से मैदान में निकल आये। यहाँ से कुछ दूर समतल मैदान के बाद पहाड़ का रास्ता शुरू होता था। हम चलते हुए मैदान के उस छोर पर पहुँच गए। जंगल में प्रवेश करते ही मैंने देखा कुछ दूर एक पेड़ के नीचे चार - पाँच लड़के बैठे ताश खेल रहे हैं। वहाँ आस - पास शराब की बोतलें टूटी बिखरी पड़ी थीं। उनमें से एक हमें देखा। उसके देखते ही सब के सब हमें देखने लगे। मैं चलते - चलते सहसा रुक गयी। मेरा मन किसी दुर्घटना के भय से आशंकित होने लगा जबकि मैंने पहले भी लड़कियों से कई बार पूछा था कि वहाँ कोई खतरा तो नहीं है न? उनके बार - बार के दिए आश्वासन से ही आज मैंने उनके साथ इस ओर आने की हिम्मत जुटाई थी। चंदा ने तेज आवाज में कहा, 'हमारी मिस हैं। हम इन्हें जंगल दिखाने ले जा रहे हैं।' उनमें से एक ने कहा, 'ठीक है। सम्हलकर जाना।' वे फिर खेलने में मस्त हो गए। चंदा ने कहा 'मिस, ये हमारे गाँव के लड़के हैं। इनसे हमें कोई डर नहीं है।' उन लड़कियों को यदि किसी से डर था तो हर आधे घंटे में चक्कर काटने वाली उन गाड़ियों में घूमने वाले अधिकारियों से जो आदिवासियों की सुरक्षा के लिए बोरीवली के नेशनल पार्क से इधर ठाणे के येऊर की पहाड़ी तक हर आधे घंटे में एक चक्कर लगाया करते थे। पहाड़ी पर मिलिट्री कैंप होने के नाते सुरक्षा और कड़ी थी। लड़कियों का मानना था कि मैं चाहे कितनी भी सामान्य बन कर आऊँ किंतु गाँव की लड़की नहीं लग सकती। सच ही तो था जिसने कभी गाँव का जीवन नहीं देखा वो चाह कर भी भला गाँव की कैसे दिख सकती थी..!
हम जंगल में प्रवेश कर चुके थे। वे मुझे पहाड़, पेड़, फूल, फल और जंगल की बातें सुनाते हुए चलने लगीं। मैं भी उनसे एक- एक पेड़ के विषय में पूछती। मेरे भीतर कोई अल्हड सी लड़की जाग उठी थी। मैं चलते - चलते कभी दौड़ती, कभी कूद कर कोई डाली पकड़ती, कभी गिरने से बचती, कभी खिलखिलाकर हँसती, कभी कोई गीत गाती हुई उनके साथ चलती चली जा रही थी। मेरे इस अप्रत्याशित रूप को देखकर लड़कियाँ और अधिक उत्साहित हो गयीं थीं। इस समय मैं उनकी जंगल संस्कृति के स्कूल की कोई विद्यार्थी सी लग रही थी और मेरी वे तीनों छात्राएँ मेरी मित्र, गुरु और संरक्षक के रूप में मेरे साथ - साथ चल रही थीं। कुछ ही दूरी पर पहाड़ के किनारे हिरणों का एक झुण्ड चरता हुआ दिखाई पड़ा। 'वो देखो हिरन। चंदा, शोभा, पल्लवी देखो कितने सारे हिरण हैं वहाँ।' जीवन में पहली बार हिरणों के झुण्ड को चरता देख मैं बच्चों की तरह ख़ुशी से उछलने लगी। लड़कियों ने कहा, 'वाह! मिस, आप कितनी लकी हैं। ये हिरण साल में एकाध बार यहाँ दिख जाते हैं। हमने भी अपने दादा से केवल सुना था लेकिन आज इतने सालों में पहली बार यहाँ हिरणों का इतना बड़ा झुण्ड देखा।' इतने सुंदर - सुंदर हिरणों के झुण्ड को देख कर मेरी ख़ुशी का ठिकाना न था। मेरी उत्सुकता, मेरी चपलता ये बता रही थी कि मानों यहीं कहीं मेरा भी बचपन बीता हो! मैं अपना सारा ज्ञान पहाड़ी के नीचे छोड़ आयी थी।
'हुस्न पहाड़ों का क्या कहना के बारहों महीने यहाँ मौसम जाड़ों का' दिसंबर की हलकी ठंड गीत का मजा चौगुना कर रही थी। पहाड़ी पर गुनगुनाने हुए चलना मुझे बहुत अच्छा लग रहा था। हम साथ चलते - चलते पहाड़ी के उस छोर पर पहुँच गये जहाँ से रास्ता पीछे की ओर जंगल में नीचे उतर रहा था। आगे बढ़ने से पहले हम इस ऊँचाई से खड़े हो कर नीचे शहर की ओर देखना चाहते थे। यहाँ से नीचे दूर तक पूरा शहर कुछ इस कदर दिखाई दे रहा था कि मानो नीचे शहर नहीं बल्कि रंग - बिरंगी कोई दरी सी बिछी हो और उस पर ऊँची - ऊँची इमारतें चॉकलेट सी बिखरी पड़ी हो! हम कुछ देर ठहर कर वह दृश्य देखने लगे। पीछे ढलान से पहले एक पुलिस चौकी दिखी जो इस समय खाली पड़ी थी। मेरे पूछने पर शोभा ने बताया कि बारिश के समय यहाँ सुरक्षा कर्मी तैनात होते हैं वे यहाँ से आगे जंगल में किसी को नीचे उतरने नहीं देते। उन्हें भी नहीं।
'मिस चलिए गाड़ी आने से पहले हमें झरने तक पहुँचना है।' चंदा के कहने पर हम उस रास्ते से पहाड़ी के पीछे नीचे को ओर उतरने लगे। रास्ता ढ़लान वाला था। नीचे उतरते समय हमारे पैर तेजी से भाग रहे थे। ऊँचाई ज्यादा न थी हम बहुत जल्द नीचे उतर आये। यहाँ ठंड कुछ अधिक थी। चारों ओर सघन सन्नाटा पसरा था। दूर - दूर तक किसी का अता - पता न था। इंसानों की दुनिया पीछे छूट चुकी थी। शहर की चिल्ल पों से दूर का ये सन्नाटा कानों को सन्न कर देने वाला था। मेरे मन में हल्का सा डर समाने लगा। आगे बढ़ते हुए मुझे यूँ लगा जैसे मैं कोई गलती कर रही हूँ। यहाँ किसी भी पल कोई जंगली जानवर आ सकता था। पत्तियों की हल्की सी सरसराहट भी दिमाग में झनझनाहट पैदा कर देती थी। हम चार लड़कियों के अलावा यहाँ दूर - दूर तक कोई नहीं था। किसी भी पल कोई भी दुर्घटना घट सकती थी। मैंने अपने को सम्हालते हुए खामोश निगाहों से उनकी ओर देखा। वे सब बिलकुल निश्चिन्त थीं। ये उनका अपना जंगल था। यहाँ उनका बचपन बीता था। उनके लिए ये आवाजें सामान्य थीं। कुछ दूर चलने पर पीछे से किसी के आने की आहट सुनाई पड़ी। धीरे - धीरे वो आहट करीब आती मालूम हुई। "हमारे पीछे कहीं वो लड़के?" सोचते ही मेरा कलेजा धड़कने लगा। गला सूखने लगा। माथे पर पसीने की बूँदे उभर आयी। मुझे लगा आज यहाँ आ कर मैंने अपने जीवन की सबसे बड़ी भूल कर दी है। एक पल को लगा कि इस पहाड़ी ने नहीं मेरी मौत ने मुझे यहाँ बुलाया है। सशंकित मन जाने क्या - क्या सोच गया। आहट तेज होती गयी। मुझसे रहा नहीं गया, "कौन है? कौन है वहाँ? कौन आ रहा है हमारे पीछे?" मेरी आवाज़ मेरे डर को छिपा न सकी। चंदा बोली, "डरिये नहीं मिस। होगा कोई गाँव का ही।" कुछ ही देर में आहट वाले कदम दिखाई पड़ने लगे। मेरे साँसों की गति तेज हो गयी। मैंने देखा एक आदमी हाथ में कोयता लिए उसी सड़क पर हमारी ओर आ रहा है। उसे देखते ही मेरे प्राण सूख गए। 'उपवन से सटी येऊर पहाड़ी पर आदिवासी रहते हैं वहाँ जाने वालों को कोयता घोंप कर मार डालते हैं।' बचपन में सुना वाक्य कानों में गूँजने लगा। इस समय मेरी ये दशा हुई कि काटो तो खून नहीं। शोभा उसे देखते ही बोल पड़ी 'बाबा कुठे चाल्लात?' (बाबा, कहाँ जा रहे हैं) वो कुछ बोल कर आगे निकल गया। चंदा ने कहा," मिस, वो हमारे अंकल हैं। रोज जंगल में फल, फूल, पत्तियाँ तोड़ने जाते हैं।" उसके जाते ही मेरे भीतर का तूफान सिमटने लगा। मस्तिष्क की माँस पेशियाँ शिथिल पड़ने लगी। मैं गट - गट पानी के कई घूँट पी कर वहीं बैठ गयी। ठंडी हवा राहत दे रही थी। हम कुछ पल वहीं रुके रहे। आदमी जंगल में बहुत आगे निकल चुका था। हमने चलना शुरू किया। कुछ दूरी पर सामने से एक दूसरा आदमी जंगली पत्तों का बोझा लिए आ रहा था। आगे घना जंगल था किंतु हमें उस ओर नहीं जाना था। हम रास्ता छोड़ नीचे झरने की ओर चल पड़े।
झाड़ियों के बीच से होते हुए हम पथरीली जमीन पर उतर आये। उसी बीच जंगल में जोरों की घरघराहट सुनाई पड़ी। मैंने चौंक कर पूछा, "ये कैसी आवाज है?” उन्होंने कहा, 'ये अधिकारीयों के गाड़ी की आवाज हैं। आप कितनी लकी हैं मिस हम रास्ता छोड़ कर झाड़ियों के बीच आ गये तब उनकी गाड़ी आयी।' अधिकारियों ने हमें नहीं देखा किंतु झाड़ियों के बीच से हमने गाड़ी को गुजरते देखा। हम आगे बढे। कुछ ही दूरी पर झरना दिखा किंतु सूखा। मैंने कहा, 'यहाँ पानी कहाँ है?' शोभा बोली, 'दिखेगा मिस आइये।' सूखे झरने के किनारे - किनारे घनी झाड़ियों के बीच सँकरी पगडंडी से वो मुझे वहाँ ले जाने लगी जहाँ से झरना शुरू होता है। चंदा और पल्लवी मेरे पीछे - पीछे चल रही थी। पगडंडी इतनी सँकरी थी कि हाथ से झाड़ी हटा - हटाकर चलना पड़ रहा था। कुछ देर चलने के बाद हम झाड़ियों से बाहर निकल आये। ऊपर खुला आसमान, नीचे बहता पानी, चारों ओर घना जंगल और दूर दिखती वह पहाड़ी जिसे डाँक कर हम यहाँ तक आये थे। ये वही जगह थी जहाँ वे मुझे लाना चाहती थी। मुझे यूँ लगा जैसे मुझे प्रकृति का कोई अकूत खजाना मिल गया हो। ठंडे पानी में हाथ पैर धो कर कुछ समय हम वही बैठे प्रकृति का आनंद लेने लगे। झरने में पानी कम था। ठंडी हवा चल रही थी। दूर - दूर तक गहरी शांति थी। मुझे प्रकृति की गोद में बैठे होने का सुखद आभास हो रहा था। इस समय हम ठाणे शहर के ऊपर की पहाड़ी से आगे की एक छोटी पहाड़ी के पीछे जंगल में झरने के बीचों बीच बैठे थे। घडी में समय देखा बारह बजने वाले थे। इस समय यहाँ जितनी ख़ुशी मिल रही थी उतना ही ख़तरा भी महसूस हो रहा था। सूरज चढ़ चुका था किसी भी समय कोई जानवर यहाँ पानी पीने आ सकता था। लड़कियाँ मेरे मोबाइल से फ़ोटो खींचने में मस्त थीं। उन्हें अपने से अधिक मेरी तस्वीर लेने में मजा आ रहा था। 'मिस ऐसे देखिये। मिस यहाँ बैठिये।' मुझे ऊँचे पत्थर पर बैठाकर हर ओर से मेरी फ़ोटो खींच रही थीं। इस समय उनकी ख़ुशी देखते ही बन रही थी। अपनी चहेती मिस को अपने जंगल में अपने बीच पा कर उनकी ख़ुशी का ठिकाना नहीं था। उनका बस चलता तो वे मुझे पूरा जंगल ही भेंट कर देतीं। वे मुझे इन रास्तों की, अपने गाँव की, बचपन व सहेलियों की, बारिश और हरियाली की कहानियाँ सुनाती जा रही थी। झरने के आगे पानी के दो छोटे कुण्ड थे। उनमें अब भी पानी जमा था। लड़कियों ने बताया कि बारिश में गाँव के सारे बच्चे इन्हीं कुंडों में कूद कर तैरना सीखते हैं। उनके यहाँ सबको तैरना आता है। 'मुझे तो तैरना भी नहीं आता। यदि इस समय यहाँ कोई जानवर आ गया तो क्या करुँगी।' मुझे डरी हुई देख कर वे हँसने लगीं। 'बहुत हँस लिए। अब चलो यहाँ से। वर्ना सच में कोई जानवर मेरा नाश्ता बना कर खा जायेगा' हम सब खिलखिला उठे। मेरा आदेश पा कर न चाहते हुए भी वे चलने को तैयार हुईं।
हम झाड़ियों से बचते हुए झरने के सूखे रास्ते के पास आ गए। झरने की दिशा में घूम कर देखा तो दूर तक झरने का पथरीला रास्ता बिना पानी के भी बहुत अद्भुत सा लग रहा था। मुझे यूँ लगा जैसे ये पत्थर नहीं बल्कि महाराज सगर के वे साठ हजार पुत्र हैं जो कपिल मुनि के श्राप से जलकर पत्थरों के रूप में इस रास्ते पर बिछ गए हो! जैसे अभी - अभी महाराज भगीरथ स्वर्ग की गंगा को मनाते हुए इसी राह से अपना रथ ले कर जाएँगे और पीछे - पीछे उमड़ती हुई पतित पावनी गंगा इन पत्थरों को स्पर्श कर शापित सगर पुत्रों को मुक्त करती हुई इन पर से गुजर जायेंगी।
उन पत्थरों पर बैठ कर तरह - तरह की फ़ोटो खींची गयी। फिर पथरीले रास्ते से चढ़ते हुए हम सड़क पर आ गए। अब जैसे मन में एक उन्मुक्त सा आकाश समाने लगा। जिस जगह पर जाते समय मुझे भय की अनुभूति हो रही थी वहीं मुझे अद्भुत सा आनंद मिलने लगा। मुझे ये जंगल बिलकुल अपना सा लगने लगा। मानों यहीं कहीं कंदराओं में हजारों - हजारों वर्ष रहकर मैंने तपस्या की हो!
सड़क पर आगे की ओर दस कदम बढ़ कर मैंने देखना चाहा। वहाँ एक छोटा सा पुल था। नीचे अंग्रेजों के समय की बिछाई हुई पाइप लाइन थी। जिनसे पहले कभी पानी की सप्लाई की जाती रही होगी! लड़कियों ने मुझे आगे जाने से रोक दिया कि आगे जाना खतरे से खाली नहीं है। उन्हें भी यहीं तक आने की इजाजत है। जंगल में इससे आगे फल - फूल तोड़ने उनके गाँव के बड़े - बूढ़े ही जाते हैं। आगे जाने का कोई कारण न था। हम लौटने लगे। थोड़ी चढ़ाई चढ़कर फिर उस स्थान पर आ गए जहाँ से नीचे पूरा शहर चटाई सा बिछा दिखाई दे रहा था। कुछ आगे आये तो दो स्त्रियाँ दो - चार बच्चों को ले कर जंगल की ओर जा रही थीं। लड़कियों ने बताया कि ये लोग कपड़े और बाल्टी ले कर वहीं झरने के पास कपड़े धोने जा रही हैं। इनके यहाँ पानी की बड़ी समस्या रहती है। हम पेड़ - पौधे देखते हुए आगे बढे तो कुछ लोगों का झुण्ड बर्तन, कपडे इत्यादि सामान के साथ जंगल की ओर जाता दिखा। मैंने आश्चर्य से पूछा, 'ये लोग इतना सारा सामान ले कर कहाँ जा रहे हैं?' लड़कियों ने बताया कि ये जंगल में लकड़ियाँ बटोर कर चूल्हा जलाएँगे। वहाँ मछली पकडेंगे। खाना बनाएँगे, खायेंगे। दिन भर वहीं रहेंगे, आराम करेंगे और शाम को गाँव लौट आएँगे। मैंने मन ही मन सोचा ये लोग तब क्यों नहीं आये जब हम वहाँ अकेले थे। यदि ये सब होते तो जंगल में घूमने का मजा किरकिरा न हुआ होता! डर - डर कर एक एक पल गुजरना न पड़ा होता! इतने सारे लोगों के बीच मैं भी खुल कर साँस ले पाती! लड़कियाँ लगभग हर आने जाने वालों से परिचित थीं। मन का ड़र पूरी तरह से खत्म हो चुका था। घना जंगल पीछे छूट चुका था।
कुछ दूर आने पर दस - बारह वर्ष के तीन बच्चे हाथ में नारियल लिए जंगल की ओर जा रहे थे। जब वे पास से गुजरे तो मैंने उन्हें देखा। वे बड़ी ख़ुशी - ख़ुशी आपस में बोलते - बतियाते, उछलते - कूदते हुए जंगल की ओर जा रहे थे। उनमें से एक के हाथ में एक बड़ा नारियल था। दूसरे के हाथ में आधा नारियल तथा तीसरे के पास नारियल का एक टुकड़ा था। शायद जंगल में बैठ कर इत्मिनान से नारियल तोड़ने, खाने व खेलने की इच्छा से वे जंगल की ओर जा रहे थे। मैंने लड़कियों से बिना कुछ कहे उन लड़कों को आवाज दी। एक ने मुड़ कर देखा। मैंने उसे हाथ के इशारे से बुलाया तो बेचारा दौड़ा चला आया। मैंने उत्सुकता वश कहा,' मुझे नारियल दोगे? उस छोटे से बच्चे ने तुरंत अपने हाथ का नारियल मेरी ओर बढ़ा दिया। मैंने कहा, "आधा नहीं पूरा चाहिए। वो वाला जो उस लड़के के पास है।' लड़कियाँ चौंक कर मेरी ओर देखने लगीं। दूर खड़े दोनों बच्चे रुक कर हमारी ओर देख रहे थे। लड़का बिना कुछ बोले दौड़ गया और बड़ा वाला नारियल ले कर मेरे पास आया। बच्चे के भोलेपन पर मैं गदगद थी। मैंने पहली बार जाना कि आदिवासी के संस्कार क्या होते हैं? वो जिसे जानता पहचानता तक नहीं उसके माँगने पर सहज ही अपनी सम्पत्ति फिर भले ही वह उनके आनंद और उल्हास की एकमात्र वस्तु क्यों न हो उसे दे देने में जरा भी संकोच नहीं करता। मैंने हँस कर कहा, "नहीं बेटा मुझे कुछ नहीं चाहिए। मैं तो बस मजाक कर रही थी।" मेरी बात उसकी समझ में नहीं आयी। वो असमंजस में पड़ गया कि जब मैंने माँगा तो अब ले क्यों नहीं रही हूँ। भोले से बच्चे ने जाने क्या समझा। उसने अपने दोनों हाथ मेरी ओर बढ़ा दिए। वह मुझे एक हाथ का आधा और दूसरे हाथ की पूरा नारियल देने लगा। दस वर्ष का छोटा सा आदिवासी बच्चा इस समय मुझे दुनिया के सबसे अमीर इंसान सा प्रतीत होने लगा। उस बच्चे का बड़प्पन देख मेरा मन भर आया। वो मेरी परीक्षा में शत प्रतिशत उत्तीर्ण हो चुका था किंतु उसके इस व्यवहार से मैं खुद अपनी परीक्षा में फेल हो गयी थी। मैंने प्यार से उसके गालों को सहलाया और कहा, 'नको मला। अशीच बोलली मी। खरच! आई शप्प्त!' (नहीं चाहिए मुझे। ऐसे ही कहा मैंने। सच! माँ कसम) बच्चों की भाषा में कही बात उसकी समझ में आ गयी थी। वो मुस्कुराया और नारियल ले कर दूर खड़े दोस्तों के पास दौड़ गया। आज पहाड़ी पर रहने वाले इन सीधे - सरल लोगों ने शहर में रहने वाली को जीवन और खुशियों की परिभाषा सिखा दी थी। मैं बिना कुछ कहे चुपचाप चल पड़ी। लड़कियाँ मेरे पीछे - पीछे चलने लगीं।
हम गाँव के करीब आ चुके थे कि अचानक तेज घरघराहट की आवाज़ गूँजने लगी। शोभा के कहा, "मिस जल्दी से सड़क के किनारे हो जाइए, अधिकारियों की गाड़ी आ रही है।" आवाज बड़ी तेजी से करीब आ रही थी हम घबरा कर सड़क से हटे। सड़क बहुत सँकरी थी केवल एक गाड़ी के जाने भर की। शायद उसी हिसाब से बनाई गयी थी। हड़बड़ी में लड़कियाँ उस ओर और मैं अकेली इस ओर खड़ी हो गयी। मेरे सम्हलने तक गाड़ी सामने आ चुकी थी बल्कि मेरे पास आ कर रुक ही गयी। गाड़ी में बैठे एक अधिकारी ने बड़ी शख़्त आवाज में मुझसे पूछा, "कौन हैं आप? कहाँ से आयी हैं? और कौन है आपके साथ?" मैंने सहजता से जवाब दिया, "मैं नीचे शहर में रहती हूँ। इन लड़कियों के गाँव आयी थी तो ये मुझे जंगल दिखाने ले आयीं।" लड़कियों की ओर देख कर उसने मुझसे कहा, "आपको पता नहीं इनके अलावा और किसी को जंगल में जाने की अनुमति नहीं है। आप नहीं जा सकतीं।" मैंने अबोध बालक की तरह 'ठीक है नहीं जाऊँगी' के इशारे में सिर हिला दिया। गाड़ी गाँव के पीछे कैंप की दिशा में घरघराती हुई निकल गयी। हम एक दूसरे को देख कर जोर - जोर से हँस पड़े। शोभा से रहा नहीं गया वो बोल पड़ी, "देखा मिस हमने कहा था न? कि आप गाँव की नहीं लगती। आप लकी हैं कि ये गाड़ी हमें जाते समय नहीं मिली।" मैं लकी थी या नहीं पता नहीं! पर आज सच में मैं अपने भाग्य को मना रही थी जिसके चलते मैंने पहाड़, जंगल, झरना, झरने की सूखी डगर और हिरनों का झुण्ड देखा था। ये लड़कियाँ मेरी छात्राएँ न होतीं तो क्या कभी मैं येऊर की पहाड़ी पर आ पाती! मैं लकी ही थी कि इतने बड़े कॉलेज में जहाँ कोर्स और विषयों की कमी नहीं थी वहाँ इन लड़कियों ने मेरे विषय को चुना था। मैं सोचती हुई चली आ रही थी कि सहसा उस किनारे दृष्टि पड़ी। अरे! हिरन कहाँ चले गए। यहीं तो थे। अभी एक भी नहीं दिख रहे। मेरे मन में एक मासूम सा सवाल उठा, 'वे हिरन ही थे न? कहीं उनके रूप में वन के देवता तो मुझे दर्शन देने नहीं आ गये थे!' मुझे अचानक याद आया जब मैं नैनीताल गयी थी तो जिम कॉर्बेट ले जाने वाले उस ट्रैवल एजेंट ने कहा था कि यदि हमारी किस्मत अच्छी रही तो ही हमें शेर दिखाई देंगे। शायद! इसी को आज ये लड़कियाँ बार बार मेरा लक कह रही थीं। मुझे अपने जंगल की सैर कराकर वे बेहद खुश थीं। हम बिलकुल नीचे आ चुके थे। ताश खेलने वाले लड़के वहीं दूर से दिख गए। हमें लौटते देख वे उठे और गाँव की ओर चलने लगे। मुझे लगा जैसे वे हमारे लौटने का इंतजार ही कर रहे थे इसलिए हमें सकुशल लौटते देख अब अपने घर की ओर चल पड़े थे।
क्या कुछ सोच लिया था मैंने और क्या पाया। शहर से दूर की ये दुनिया शहर से कई गुना अधिक साफ सुथरी निकली। त्याग, समर्पण, अपनापन जंगल और पहाड़ के ये सारे गुण इन आदिवासियों के रूप में मूर्तिमान खड़े थे। मैं अपने आप को इनके आगे बहुत छोटा महसूस करने लगी थी। हम गाँव पहुँच गए। लड़कियाँ मुझे बसस्टॉप तक छोड़ने आयीं। मैं बहुत देर तक चुप रही। मुझे वहाँ से बस ले कर नीचे की उस कृत्रिम दुनिया में लौटना था जहाँ से इन्हें हिंसक अथवा पिछड़े हुए लोगों के रूप में देखा जाता रहा।
डॉ. जयश्री सिंह
सहायक प्राध्यापक एवं शोधनिर्देशक, हिन्दी विभाग,
जोशी - बेडेकर महाविद्यालय ठाणे, मुंबई – 400601
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