डायरी : एक प्राध्यापक की डायरी (पृष्ठ - 3)
वे भी क्या दिन थे जब विश्विद्यालयों में युवक - युवतियों के बीच संकोच की एक अदृश्य सी दीवार दुश्मन बने बैठी थी। साथ उठना - बैठना तो दूर पब्लिक प्लेस पर नजर उठा के देख लेना भी सपन सा था। आते - जाते नैना लड़ जाने, मीठी मुस्कान का आदान - प्रदान हो जाने भर से कइयों की धड़कनें तेज हो जाया करतीं।
लड़कियाँ खुश थी कि उन्हें कॉलेज जाने और पढ़ने की आजादी मिली है। वे नियमित कक्षा में बैठकर सारे लेक्चर्स अटेंड करतीं। कॉलेज के प्रति लड़कों की इमानदारी भी देखने योग्य थी। खूबसूरत लड़कियों को बेरोक - टोक चार घंटे निहारने की कक्षा से अच्छी जगह भला और क्या हो सकती थी। कुलमिलाकर पहले लेक्चर से अंतिम लेक्चर तक कक्षा में सब का मन लगा रहता।
बेचारे प्राध्यापक भरी क्लास देख कर इस भ्रम में खुश हो जाया करते कि विद्यार्थियों को उनकी कक्षा में रूचि है। ख़ुशी के मारे कई बार वे घंटे से एक्स्ट्रा पढ़ा दिया करते। कुछ की ख़ुशी इतने चरम पर होती कि वे पूरा लेक्चर ही लड़कियों की ओर देख कर पढ़ा देते। बेचारे लड़के...!
क्या दिन थे वे...!
प्राध्यापक पढ़ा के खुश,
कुशाग्र विद्यार्थी सवाल - जवाब (active participation) से भरी क्लास में अपना इम्प्रेशन जमा के खुश,
कोई चुपके से नजरें मिला के खुश, तो कोई हौले से मुस्कुरा के खुश।
जब से दोनों के बीच की सारी दूरियाँ मिट गयी...
तब से हमारी कक्षा की रौनक लुट गयी...
बेचारे प्राध्यापकों की ख़ुशी को जाने किसकी नजर लग गयी!
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