कविता : मौत घूम रही है

साया नहीं
साक्षात मौत
घूम रही है
जंगल के इर्द - गिर्द
चमकीले बियाबानों में
उलझी जिंदगियों को
पल में रिहा कराने
घूम रही है
शॉपिंग मॉल के बेसमेंट में
कंपनी के कम्पाउंड में
तीन सितारा होटल के पार्किंग ज़ोन में
बेख़ौफ़ देखी जा रही
सभ्यता के मुकामों में
ऊँचे दुकानों में
जमीन का बदला जान से
मशीन का इंसान से
जंगल का ईमान से
लेने को प्रतिशोध
वह मादा नरभक्षी
लुक - छिप कर
डोल रही है
अपने में खोयी
अचेत चेतनाओं पर
मौत - सी मंडरा रही है।
जंगल में गुमनाम
शहर में बदनाम
नहीं है वन रक्षकों की
गिनती में उसका नाम
नहीं मिला शरीर पर
छोड़ा हुआ कोई निशान
विभाग ने शहर को वन की जमीन दी थी
शहर वन को जिंदा तेंदुआ दे रहा है
जमीन और जीवन के कारोबार में
शहर भी ख़ूब फल - फूल रहा है
कभी यहाँ वनजीवन संकट में था
आज जनजीवन असुरक्षा में जी रहा है...!
#जयश्रीसिंह

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