विचार : पूँजी, पद, पदोन्नति से राजनीति तक
उत्तरआधुनिक काल पूँजी के बल पर चीजों के इस्तेमाल का काल है। यह आधुनिकतावाद के कहीं आगे का काल है। इस काल में वस्तुओं के साथ व्यक्ति के 'यूज़ एन्ड थ्रो' की नई संस्कृति ने जन्म लिया। भारत जैसे बहुसांस्कृतिक देश में पूँजी के बल पर सर्वोच्च स्थान पर राज करने वाली इस संस्कृति को हम 'कॉर्पोरेट कल्चर' के नाम से जानते हैं। यह एक अमूर्त व्यवस्था है इसका प्रभाव परिवार से राजनीति तक देखा जा सकता है। सामाजिक संबंधों का वस्तुकरण (commodification) कर देना ही इस संस्कृति का मुख्य उद्देश्य है।
हमारे देश में सत्ता तक पहुँचने के लिए विद्या और बुद्धिबल से अधिक धनबल का महत्त्व है। जो जितनी अधिक पूँजी जुटा पाता है वो उतना अधिक योग्य माना जाता है। योग्यता की इसी प्रक्रिया में व्यक्ति पूँजी की ओर झुकता है। पूँजी मीडिया को साधन बनाती है और व्यक्ति के जरिये सत्ता तक पहुँचती है। यही पूँजी अपनी नीतियों से कर्जदार को कर्जमुक्त कराती है और कर्जमुक्त को कर्जदार बनाती है। अब तक जिसने भी इनकी शर्तें स्वीकार की वे मठाधीश हुए जो इनसे अलग - थलग रहे वो शो पीस हुए। (या ये कहिये कि इस्तेमाल करके फेंक दिए गए)
पूँजी से मिली शक्ति पर इठलाना भी एक प्रकार की मूर्खता है। पूँजी जो कुछ देती है उसके बदले में हमारे निर्णय लेने की आजादी छीन लेती है। वह हमें वस्तु बना कर इस्तेमाल करती है। हम पर अपनी नीतियाँ थोपती है। कुलमिलाकर हमें वैचारिक रूप से पंगु कर देती हैं। ये वो बुरी ताकतें हैं जो पूजे जाने पर सानुकूल रहती हैं, विरोध में जाते ही सर्वस्व छीन लेती हैं। (वर्तमान राजनीति में वरिष्ठ एवं स्वाभिमानी नेता लालकृष्ण आडवाणी जी की स्थिति को इसके उदाहरण के रूप देखा जा सकता है। कॉर्पोरेट पूँजी के 'यूज़ एन्ड थ्रो' के इस राजनीतिक शो में बेचारे आडवाणी जी घर के उस उपेक्षित और अपमानित बूढ़े की तरह हैं जो न वृद्धाश्रम में जा पा रहा है और न घर में कहीं कोई सम्मान पा रहा है। वह वृद्ध जो लाल किले में अगली कतार में बैठ कर चुपचाप सिर झुकाए कभी किसी का भाषण सुनने तो कभी किसी की अंत्येष्टि में खामोश यंत्रचालित से दो फूल चढ़ाकर अपनी जगह पर वापस लौट जाने के लिए विवश है।) इसी को हम कह बैठते हैं - 'कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी वर्ना'
बहरहाल, कंपनी, ऑफिस, व्यवसाय, बाजार, मीडिया या फिर सत्ता हर कहीं पूँजी ही इस पूरे तंत्र का मुख्य सूत्रधार है। पूँजी के इस तंत्र को समझे बिना देश की वर्तमान स्थिति को समझ पाना संभव नहीं। अत्याधुनिक काल ऐसी ही पूँजीधारी मनमानी ताकतों का काल है। इन ताकतों को पूजना भी एक प्रकार के अन्धविश्वास में जीना है।
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