आलेख : वाद - विवाद, संवाद वाले एक युग का अंत

डॉ. नामवर सिंह के 'वाद - विवाद, संवाद वाले एक युग का अंत'

साहित्य की दुनिया में अभी होश संभाला ही था जब पहली बार उन्हें मुंबई विश्वविद्यालय के मंच पर देखा था। उनका व्यक्तित्व देख कर मैं चकित थी। मैं ही क्यों? न जाने कितने विश्वविद्यालयों की कितनी नव प्रतिभाएँ उनके विराट अध्ययन पर मोहित थीं। वे हम सब के आदर्श थे। गुरुरूप में भी हम युवाओं के हीरो थे। प्राचीन से लेकर नई से नई आधुनिक प्रवृति का गहन अध्ययन, पूर्व और पश्चिम का समन्वय, भक्त कवियों से लेकर नव्यतम कला आंदोलन, अकविता, अकहानी, नई समीक्षा, अतियथार्थवाद आदि पर उनकी टिप्पणियाँ, आधुनिक सिनेमा, नाटक, संगीत, गालिब, मीर, टैगोर, फ़ैज, गांधी, लोहिया, जीवनानंद दास, विमल मित्र, ताराशंकर, समरेश बसु, सत्यजीत रे और मृणाल सेन का सिनेमा, ज्योति फुले, आम्बेडकर के विचार, 19 वीं सदी का नव नवजागरण, स्वाधीनता आंदोलन, वाम पंथ की मुश्किलें, नया पूंजीवाद, बाज़ार, टेक्नोलॉजी और न जाने कितने - कितने विषयों के गहन अध्येता और कुशल वक्ता थे।

पिछले दिनों देखते ही देखते हिन्दी साहित्य जगत के जगमगाते दीप एक-एक कर बुझते चले गए। राजेन्द्र यादव, चन्द्रकांत देवताले, कुंवरनारायण, केदारनाथ सिंह, विष्णु खरे, दूधनाथ सिंह, कृष्णा सोबती, अर्चना वर्मा और अब डॉ. नामवर सिंह।

साहित्य और आलोचना के इन स्तम्भों के गिरने पर आम तौर पर हम किसी अपूरणीय क्षति की बात को यांत्रिक ढंग से दोहरा कर आगे निकल जाते हैं जबकि इस अपूरणीय क्षति से अचानक घिर आयी रिक्तता को गहराई से समझने की आवश्यकता है। साहित्य के अपने इन अभिभावकों को खो कर क्या हम लगातार निराधार नहीं हो रहे? क्या ये लोग अब दोबारा हमें देखने को मिलेंगे? सोचने वाली बात है...

ये उस पीढी के लोग थे जिन्होंने स्वाधीनता आंदोलन के दौर में अपनी आंखें खोलीं थी। जब देश में नए स्वप्न का जोश और नई उमंगें थीं, सामाजिक आंदोलन थे, वामपंथी विराट यूटोपिया थे, राजनीति में प्रतिपक्ष की एक संस्कृति थी, असहमति के स्वर को गरिमा दी जाती थी, समाज में बड़े व्यक्तित्व और बड़ी सोच थी, एकेडेमिक जगत में अध्ययन - अध्यापन और विचार का एक विशेष वातावरण था।

नामवर सिंह, कुंवर नारायण या केदारनाथ सिंह यूँ ही पैदा नहीं हो जाते। उनका जन्म अपने समय के सांस्कृतिक पर्यावरण, उसकी अंदरूनी धड़कनों और अपने परिवेश के हवा - पानी से होता है। क्या आज हमारे लिए ऐसा परिवेश सम्भव है?

अभी दो दिन पहले विष्णु नागर जी ने अपनी एक पोस्ट में लिखा था कि यह बौने राज नेताओं का युग है। गौर से देखें तो हम पाते हैं कि यह कला, संस्कृति और साहित्य के क्षेत्र में भी बौने व्यक्तित्वों का समय है। नामवर सिंह जैसे विद्वान आचार्य के जाने को इस व्यापक संदर्भ में देखा जाना चाहिए। वे एक अलग परिवेश की उपज थे।

नामवर जी ने एक मामूली गाँव जीयनपुर की 'गरबीली गरीबी' (इस पद के लिए आदरणीय काशीनाथ सिंह का आभार) से देश की आधुनिकतम यूनिवर्सिटी JNU तक का परिवेश देखा, गली छाप नेताओं से लेकर देश के बड़े - बड़े राजनेताओं और संस्कृतिकर्मियों तक अपने दायरे को फ़ैलाया, नवोदित लेखकों में अपनी जिज्ञासा रखी, हिंदी के बाहर अखिल भारतीय स्तर के बड़े साहित्यकारों, इतिहासकारों, प्रशासकों, कलाकारों तक से एक निकट संपर्क रखा, खैनी मली, तम्बाकू वाला बनारसी पान खाया, त्रिलोचन के साथ लँगोट पहनकर वाराणसी के घाट से गंगा में छलांग लगाई और पेरिस के नए कला आंदोलनों के बारे में बात की। वे बतरस के महत्व और वाचिक परम्परा को जानते थे, गहराती शामों में घण्टों किसी मुद्दे पर मन की तरंग में बतियाते डूब सकते थे। उनकी टकराहट उस वातावरण में अज्ञेय से भी होती और भारती जी से भी। वे नागार्जुन को भी समझ सकते थे और निर्मल वर्मा को भी। वे निराला के पास भी जा सकते थे और शमशेर के पास भी। वे कबीर को भी केंद्र में खड़ा कर सकते थे और तुलसी को भी। वे फिराक पर भी बात कर सकते थे और फ़ैज़ पर भी। ये सारे छोर उनकी आधुनिक संवेदनाओं के बेहद करीब थे। यह सब उन्हें अपने व्यक्तित्व में एक पूंजी की तरह अपने देसज परिवेश से मिला था। यह देसज परिवेश जिसमें एक ज़मीन के आदमी के बौद्धिक रेंज में कितनी विपरीत धाराओं और प्रवृतियों का संगम हो सकता है इसकी सूची बनाने यदि हम बैठे तो वह बहुत लंबी हो जाएगी।

उनकी सबसे बड़ी खूबी यह थी कि जिन्हें हम एक दूसरे का विपरीत और विलोम समझ कर बातें करते, वे एक विराट बौद्धिक मेधा के चलते इन विलोमों के बीच किसी उभयधर्मिता की खोज कर सबको चकित कर देते थे। उन्हें विषयों की तलाश नहीं थी, उन्हें किसी द्वंद्वात्मकता की खोज रहती थी और उस द्वंद्वात्मकता के साथ वे दूर तक जा सकते थे, एक खेल रच सकते थे। यह उनकी वाकपटुता भी थी और कई बार उनका आपधर्म भी। अपने इंटरव्यू में, भाषण में, लेखों में, अंतरंग गपशपों में, पिछले 70 सालों में इस खेल को उन्होंने जिस तरह से रचाया वह बेमिसाल है। वे गोष्ठियों में एक स्थायी अध्यक्ष होते थे। सबकी बातें सुनने के बाद सबके तर्क उलटते हुए अपनी बात कहते थे और सब पर भारी पड़ जाते थे। यह उनका करिश्मा भी था और एक अभूतपूर्व मेधा भी और कई बार तो एक दिलचस्प खेल भी। ऐसे स्थायी अध्यक्ष या गोष्ठियों के अंतिम वक्ता के जाने से जो रिक्तता आई है, वह एक युग का अंत है।

उन पर बहुत सारे विशेषांक निकले, सैकड़ों की संख्या में लेख लिखे गए, दर्जनों लोगों ने पीएचडी डिग्रियां हासिल कीं लेकिन नामवर सिंह की द्वंद्वात्मकता, उनके खेल, उनकी मस्ती, उनकी विकलता और उनके भटकावों अथवा व्यर्थ चली गयी संभावनाओं को अभी आने वाली युवा पीढी को व्यवस्थित करना है। एक ऐसी युवा पीढी जिसके लिए नामवर सिंह एक पुरुष नहीं, एक मिथक की तरह से हैं। जब उनके बहुत सारे अन्तर्विरिधों का एक गहन आकलन होगा तो उसमें देश की आज़ादी के बाद के सत्तर वर्षों के हमारे सांस्कृतिक इतिहास और परिवेश का अध्ययन भी होगा। नामवर जी का जाना मेरे लिए इन अर्थो में बहुत दिलचस्प मुद्दा है। उन पर कार्य करने की वास्तविक चुनौतियां हैं। यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि उनकी खुशामद करके अब न तो कोई पहचान पायी जा सकती है और न कोई पुरस्कार।

भारत में सामन्तवाद और पूंजीवाद के बेमेल विकास के इस आधुनिक युग की पोषित संस्कृति में चीर - फाड़ हेतु प्रकट हुआ वह नरसिंह अवतारी पुरुष आज चला गया जो आधा बाहर था, आधा भीतर। आधा सुबह में था आधा शाम में। आधा जल में और आधा भूमि पर। आधा तर्क में था और आधा भावना में। आधा विमर्शों में था और आधा किस्सों - गॉसिपों में, आधा लोक में था और आधा इतिहास में। आधा कबीर में था और आधा केशव में। आधा हज़ारी प्रसाद दिवेदी में था और आधा मुक्तिबोध में। आधा रूसी साम्यवाद में था और आधा नव वामपंथ में। आधा गोर्की में था और आधा न्यू क्रिटिसिज्म में।

उनका एक नया, तटस्थ, संवेदनशील और ईमानदार मूल्यांकन तो अब होना है।

उनके जाने से वास्तव में साहित्य जगत की अपूरणीय क्षति हुई है। विश्वास कीजिये यह एक रस्मी और यांत्रिक अभिव्यक्ति नहीं है।

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