यात्रावृतांत - 'मंटो के जीते जागते अफ़सानों की बम्बई'


कौन कहता है कि बीती सदी के साथ वो पुराना समय बीत गया। शहर के सीने में किसी रहस्य सा दबा अपने जीवन की साँझ को बूढ़ी आँखों से देखता मैला - कुचला सा वो पुराना शहर आज भी इस महानगर के भीतर जीवित है।

कैनेडी ब्रिज के उस ओर चमचमाती नई इमारतें इस ओर पुरानी दुमंजली चालें जिनकी खिड़कियों से मुजरे वालियाँ अपने  सजीले रूप की झल्कियाँ दिखा कर अपने ग्राहकों को लुभातीं और ऊपर ब्रिज पर खड़े लोग इन गलियों में गहराती शामों के साक्षी बनते। उन दिनों इन कोठों पर घुंघरुओं की छमक जितनी सघन होती इस समय संगीत मंडल की यह गली उतनी ही शांत और उदास सी दिखी। छप्परों पर बारिश की नाचती हुई बूंदें अपनी रिमझिमाहट से इतिहास में बजते घुँघुरुओं की प्रतिध्वनि सुनाने का प्रयास कर रही थी। जिस गली में मुस्तैद दलाल ग्राहकों के अलावा किसी को भीतर जाने न देते उस गली में प्रवेश कर पाना आज बेहद सहज था। हम गली से होते हुए पिछवाड़े आँगन की ओर गए। जहाँ सौ साल पुरानी दरगाह से उड़ती हुई धूप-बत्ती की सुगंध भीगे मौसम को और भी खुश्बूदार बना रही थी। हम देर तक बड़े मियाँ से दरगाह के विषय में पूछते रहे। पार्श्व में बिना किसी ध्वनि के तबले और घुंघरुओं की सम्मिलित गूँज कानों में अठखेलियाँ करती रहीं। उन ख़ुशगवार हवाओं में घुली-मिली 'पाकीज़ा' की 'इन्हीं लोगों ने ले लीन्हा दुपट्टा मेरा' की संगीन लहरियाँ रोम - रोम को छू गयीं। बारिश के कम होते ही हम दरगाह के अहाते से निकल कर गली से होते हुए सड़क पर आ गए। गली में इक्के - दुक्के खुले कमरों में कुछ मजदूर अपने लघु उद्योगों में जुटे दिखाई पड़े। जाहिर था कि मुज़रा इन गलियों से ही नहीं पूरे शहर से कहीं दूर बहुत पीछे छूट चुका है।

चौराहे पर इस ओर संगीत गली, उस ओर ज्योति स्टूडियो  (आज भी यहाँ कुछ फिल्मकारों के ऑफिस तथा अन्य कार्यालय हैं) और ठीक सामने बम्बई का प्रसिद्ध कांग्रेस हॉउस। जहाँ आजादी से पूर्व देश के सारे बड़े कार्यकर्ता ऐतिहासिक चरण के निर्णयों की बैठकें किया करते थे। आश्चर्य ही था कि गुलामी की जंजीरें और आजादी की योजनाएँ एक ही मोड़ पर एक दूसरे से टकरा रही थी।

ग्रांटरोड का ये रेड लाइट इलाका - मनोरंजन, फ़िल्म - व्यवसाय और राजनीति तीनों ही दृष्टि से बेहद महत्त्वपूर्ण रहा है। किसी समय यहाँ दर्जनों सिनेमाघरों और पारसी थियेटरों की तूती बोलती थी। यह स्थान हर छोटे - बड़े सिनेमा प्रेमियों का आकर्षण स्थल हुआ करता था- इम्पेरियल सिनेमा, मिनर्वा सिनेमा, नाज सिनेमा, स्वस्तिक सिनेमा, सिल्वर टॉकीज, न्यू रोशन टॉकीज, गुलशन सिनेमा, अल्फ्रेड टॉकीज़, विक्टोरिया थिएटर कंपनी, नॉवेल्टी सिनेमा - लेमिंटन रोड से कमाठी पुरा तक सड़क के दोनों छोरों पर खड़े ये दर्जनों थियेटर उस बीत चुके समय में अपने ऐश्वर्य और पतन की दास्तान सुनाते रहे। आज इनकी सारी भव्यता मॉल और मल्टीप्लेक्स में बँट चुकी है। समय के साथ इन इमारतों ने अपनी समृद्धि खो दी है। आज ये निम्न वर्ग की मामूली सी भीड़ के लिए सस्ते अश्लील फिल्मों के प्रदर्शन स्थल बन चुके हैं।

मंटो की गली की ओर बढ़ते हुए हमने बम्बई के पहले हिन्दी विद्यालय (मारवाड़ी विद्यालय) की इमारत को देख लेना चाहा। जो प्रगतिशील लेखक संघ की पहली सभा स्थल होने के नाते अपना ऐतिहासिक महत्त्व रखती थी। उसके ठीक सामने खेतवाड़ी कम्युन की इमारत जो आज उस बीते इतिहास सी जर्जर हो चली थी। इस रोड से होते हुए हम भारत कॉफी हॉउस कॉर्नर पर पहुँचे और वहीं से कमाठी पुरा लेन की ओर बढ़ गए।

ये वही सड़क थी जो हमें कदम दर कदम मंटो की अरब गली की ओर ले जा रही थी। बसों - गाड़ियों, लोगों की पैदल आवाजाहियों, किनारे खड़ी टैक्सियों, दुकानों, कार्यालयों, अनगिनत छोटे - बड़े वर्कशॉपों, चीनी दाँत के दवाखानों तथा पुराने टॉकीजों से पूरी तरह गुलजार यह इलाका मंटो के अफसानों का जीता जागता गवाह है। ये वही इलाका है जो मंटो की कहानियों में कई बार जीवित हो उठा था। इन्हीं गलियों में औसत स्तर का जीवन जीने वाले लोग उनके अफसानों में कई - कई बार उकेरे जा चुके थे।

कमाठी पुरा लेन जिस्मफरोशी के व्यवसाय में लिप्त वेश्याओं का बदनाम इलाका है। फुटपाथ पर दस - दस कदम की दूरी पर कतारों में खड़ी ग्राहक तलाशती वेश्याओं, खिड़कियों - दरवाजों से पर्दों की ओट से झाँकती कमसिनों की उदासी हमें भीतर तक कचोट गयी। पूरे सड़क पर लाचारी के ये बिखरे दृश्य विचलित कर देने वाले थे। हम जल्दी जल्दी चलकर इस सड़क को पार कर जाना चाहते थे। सड़क के किनारे की अँधेरी खोलियाँ, सँकरी गलियाँ, उनसे लगी नारकीय कोठरियाँ ऊब और अकुलाहट के अफ़साने रच रहीं थी। इन्हीं खोलियों में पिछले कई दशकों से वे अपने ग्राहकों को लुभाकर ले जाती रहीं। पिछली सदी से आज तक यहाँ कितनी पीढ़ियाँ बीत गयीं। शहर ने अपने रूप के साथ अपना नाम तक बदल दिया किंतु इन गलियों में बसती बम्बई आज भी अपने दुर्भाग्य को नहीं बदल पायी।

कमाठीपुरा लेन के अगले सिग्नल पर शानदार अल्फ्रेड टॉकीज़ जिसमें प्रदर्शित फिल्मों के कई पोस्टर हुसैन साहब अपनी कूची से बनाया करते थे। इसी के ठीक सामने है मंटो की 'अरब गली'। हम बिना देर किये 'अरब गली' में प्रवेश कर गये। चौराहे के किनारे वाचनालय पर कुछ सफेद टोपीधारी बुजुर्ग उर्दू अख़बार पढ़ने में मशगूल दिखे। कुछ कदम चलते ही मंटो की खोका बिल्डिंग दिख गयी। हम देर तक नीचे खड़े उसकी बनावट और जर्जरता को निहारते रहे। मेरी नजर उस खोली को खोजने लगी जिसमें कभी सआदत हसन मंटो रहा करते थे। बिल्डिंग की दशा देख उसमें प्रवेश करने की बिलकुल हिम्मत नहीं हुई। अलबत्ता दूसरी मंजिल की बालकनी से एक बूढ़े मियाँ बड़ी उम्मीद और कौतुहल से हमारी ओर देखने लगे। गोया कोई मेहमान उन्हीं का पता खोजता उन तक पहुँच रहा हो।

मन में कुछ जिज्ञासा लिए हम गली के अगले छोर पर स्थित मस्जिद तक गए। गली से सटी छोटी - छोटी गलियाँ, पुरानी चालें, छोटी - छोटी खिड़कियों, अँधेरे कमरे, फटेहाल सी पुरानी दुकानें, दुकानों पर (उर्दू में लिखे) लटके हुए पीले पड़ चुके तख्त और इस सबके बीच मस्जिद से आती हुई अजान की आवाज़।

क्या ये वही मंटो वाली बम्बई नहीं है? दशकों पुरानी वाली बंबई...!मेरी आँखों के सामने का ये पूरा इलाका क्या सचमुच मुंबई का हिस्सा है? मुझे हैरत सी हो रही थी। मुझे अपने देखे पर यक़ीन नहीं हो रहा था कि मुंबई के भीतर पिछली सदी की वो पुरानी बम्बई आज भी जीवित है।

चौराहे पर खड़े हो कर हमने चारों ओर नजर दौड़ाई। कई नई इमारतें इलाके के इर्द - गिर्द घिर आयी दिखीं। उनकी तासीर बता रही थी कि बहुत जल्द वे इस ओर अपनी हमशक्लें बना लेंगीं। कुछ ही सालों में विकास का असाध्य रोग इन गलियों में अपनी जड़ें जमा लेगा। कौन जाने बम्बई की ये जर्जर निशानियाँ और कितने साल उस समय की याद दिला पाएँगी? कुलमिलाकर तसल्ली यही कि ढ़हने से पहले इस विरासत को हमने भी एक नजर देख लिया।

डॉ. जयश्री सिंह, मुंबई

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