विचार : जनसंस्कृति और जनचेतना
ये उन दिनों की बात है। जब गली - गली दौड़ते थे।
माँ जब भी दुकान भेजती ; एक पैर जमीन पर पटक कर ओठों को झनझनाकर मोटर की आवाज निकालते और अपने दो पैरों की गाड़ी स्टार्ट कर तेजी से निकल पड़ते। अपनी गाड़ी सीधे नुक्कड़ के पंसारी की दुकान पर जा कर ठहरती। फिर दुकान से जो स्टार्ट होती तो सीधे घर।
चलना तो जैसे जानते ही नहीं थे। दौड़ने में जाने कौन सा रोब महसूस होता। दौड़ने के कई तरीके आते थे। कभी - कभी एक-एक पैर उछालकर घोड़े की चाल से दौड़ते। रबड़ में बँधे मेरे लंबे चमकीले - सुनहले बाल पीठ पर इधर- उधर होते तो धूप में अपनी ही परछाई देख मुझे बहुत अच्छा लगता। जल्दबाजी में माँ को दरवाजे से सामान पकड़ाती और इसके पहले कि माँ कोई दूसरा काम कहती मेरी गाड़ी गली के आगे अगले छोर तक पहुँच जाती। तब चप्पल पहनना गति में अवरोध मालूम देता। जब से चप्पल पहनने का सऊर आया। गली-गली दौड़ना छूट गया।
जब शहर में गणपति बप्पा आते हैं तो बचपन की यादें साथ ले आते हैं। हम सब बच्चे सुबह-दोपहर-शाम नियम से कभी इस पंडाल तो कभी उस पंडाल में खड़े होकर ताली पीट-पीट कर आरती गाते। ख़ूब रामदाने बटोरते और खाते। चम्मच गोटी और दौड़ में हिस्सा लेते। किसी भी पंडाल की एक भी प्रतियोगिता हमसे छूटने न पाती।
मैं स्टेज़ प्रतियोगिता में भी जान छिड़क कर नाचती। कई बार देर होने के डर से अपना परफॉर्मेस होते ही घर भाग आती तब पीछे से कोई सन्देश लेकर आता कि अंत में पुरस्कार के लिए तुम्हारे नाम की घोषणा हुई है। मैंने कई प्रतियोगिताओं में प्रथम पुरस्कार जीता। कितने-कितने इनाम बटोरे। परिवार का अलबम इन्हीं तस्वीरों से भरता जाता। आगे की कक्षाओं तक पहुँचते - पहुँचते रुचियाँ बदलती गयीं। नृत्य और चम्मच गोटी की जगह निबंध और काव्य प्रतियोगिताओं ने ले ली।
हमारे सर्वांगीण विकास में हमारी जनसंस्कृति कितनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। समय के साथ हम इसमें पलते बढ़ते जाते हैं और ये धीरे - धीरे हममें रचती-बसती जाती है। आगे चलकर यही जनसंस्कृति हमारे साहित्य में उतरती है और हम इस में जी कर संवेदनाओं को रचने की कला पाते हैं।
माँ जब भी दुकान भेजती ; एक पैर जमीन पर पटक कर ओठों को झनझनाकर मोटर की आवाज निकालते और अपने दो पैरों की गाड़ी स्टार्ट कर तेजी से निकल पड़ते। अपनी गाड़ी सीधे नुक्कड़ के पंसारी की दुकान पर जा कर ठहरती। फिर दुकान से जो स्टार्ट होती तो सीधे घर।
चलना तो जैसे जानते ही नहीं थे। दौड़ने में जाने कौन सा रोब महसूस होता। दौड़ने के कई तरीके आते थे। कभी - कभी एक-एक पैर उछालकर घोड़े की चाल से दौड़ते। रबड़ में बँधे मेरे लंबे चमकीले - सुनहले बाल पीठ पर इधर- उधर होते तो धूप में अपनी ही परछाई देख मुझे बहुत अच्छा लगता। जल्दबाजी में माँ को दरवाजे से सामान पकड़ाती और इसके पहले कि माँ कोई दूसरा काम कहती मेरी गाड़ी गली के आगे अगले छोर तक पहुँच जाती। तब चप्पल पहनना गति में अवरोध मालूम देता। जब से चप्पल पहनने का सऊर आया। गली-गली दौड़ना छूट गया।
जब शहर में गणपति बप्पा आते हैं तो बचपन की यादें साथ ले आते हैं। हम सब बच्चे सुबह-दोपहर-शाम नियम से कभी इस पंडाल तो कभी उस पंडाल में खड़े होकर ताली पीट-पीट कर आरती गाते। ख़ूब रामदाने बटोरते और खाते। चम्मच गोटी और दौड़ में हिस्सा लेते। किसी भी पंडाल की एक भी प्रतियोगिता हमसे छूटने न पाती।
मैं स्टेज़ प्रतियोगिता में भी जान छिड़क कर नाचती। कई बार देर होने के डर से अपना परफॉर्मेस होते ही घर भाग आती तब पीछे से कोई सन्देश लेकर आता कि अंत में पुरस्कार के लिए तुम्हारे नाम की घोषणा हुई है। मैंने कई प्रतियोगिताओं में प्रथम पुरस्कार जीता। कितने-कितने इनाम बटोरे। परिवार का अलबम इन्हीं तस्वीरों से भरता जाता। आगे की कक्षाओं तक पहुँचते - पहुँचते रुचियाँ बदलती गयीं। नृत्य और चम्मच गोटी की जगह निबंध और काव्य प्रतियोगिताओं ने ले ली।
हमारे सर्वांगीण विकास में हमारी जनसंस्कृति कितनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। समय के साथ हम इसमें पलते बढ़ते जाते हैं और ये धीरे - धीरे हममें रचती-बसती जाती है। आगे चलकर यही जनसंस्कृति हमारे साहित्य में उतरती है और हम इस में जी कर संवेदनाओं को रचने की कला पाते हैं।
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