संस्मरण : श्याम सलोना प्यार



किशोरावस्था प्रेम और आकर्षण के लिए यूँ ही बदनाम नहीं है। इस उम्र ने कईयों को ठगा है। उन दिनों दूरदर्शन पर रामानंद सागर कृत 'श्री कृष्णा' सीरियल आता था। सन्डे की सुबह कुछ लोग नियमित हमारे घर टीवी देखने पहुँच जाया करते उनके कारण हमें भी जल्द ही उठकर बिस्तर समेटकर टीवी के सामने बैठना पड़ता था।

देवकी - वसुदेव की विवशता, कंस की नाटकीयता, यशोदा की ममता, ग्वालिनों की वाक्पटुता मेरे मन में सीरियल के प्रति रूचि बढ़ाने लगी। हर सन्डे बालक कृष्ण का एक-एक असुर को मारते जाना बड़ा मजेदार लगता। कृष्ण लीलाएँ हर सन्डे आगे बढ़ती रहीं। गाय चराने, गोपियों को रिझाने, बाँसुरी बजा कर राधा को बुलाने वाले किशोर नायक ने सीरियल से निकलकर मेरे मन को कब लुभा लिया पता ही नहीं चला। रही सही कसर उनकी वंशी की धुन ने पूरी कर दी। बैकग्राउंड में बजने वाला वेणुगीत धीरे - धीरे भीतर तक समाने लगा। कृष्ण के बाँसुरी की मादक धुन हृदय के आर पार बिंध गयी। मैं विकल हो कर कृष्णलीला का इंतजार करने लगी। आने वाला हर सन्डे मेरे हृदय की पीड़ा बढ़ाने लगा था।

उस वर्ष जन्माष्टमी के दिन मैंने व्रत रखने का निश्चय किया। व्रत रखा और वो भी निर्जला। पूरे दिन कुछ न खाया, न पिया। माँ के लाख मनाने के बाद भी पानी तक को न छुआ। शाम होते-होते मेरी हालत पस्त हो गयी। माँ कभी पानी, कभी चाय तो कभी दूध ले कर पी लेने की मनुहार करती रही। मेरा मन कुछ भी ग्रहण करने को तैयार न था। मुझे डर था कि जल पी लेने से मेरे प्यार में कहीं कमी न पड़ जाये। माँ कुछ समझ नहीं पा रही थी कि आख़िरकार उनकी दुलारी किसके बहकावे में आ गयी है। किसी तरह रात के बारह बजे। व्रत पूर्ण हुआ।

अगली सुबह मैंने जिद कर दी कि मैं जुहू इस्कॉन मंदिर ( ISKCON - International Society for Krishna Consciousness) जाऊँगी। मैंने इस मंदिर का नाम भर सुना था। मैं क्या? मेरे परिवार के किसी भी सदस्य ने जुहू का वह भव्य मंदिर देखा तक नहीं था। माँ के लिए मुझे वहाँ तक ले जाना संभव न था। उन्होंने पापा को मनाया। पापा के लिए कंपनी और घर से अधिक ईश्वर की और कोई सत्ता न थी। ईश्वर से उन्हें कभी कोई वास्ता न रहा, न ही कोई आस्था रही। उन्हें मंदिर के लिए मनाना टेढ़ी खीर थी। पापा भगवान के नहीं किंतु सुपरस्टार अमिताभ बच्चन के आजीवन बड़े फैन रहे। ये तय कर कि जुहू में वे बच्चन साहब का बंगला देख लेंगे। मुझे ले चलने के लिए तैयार हो गए।

हमने चेकनाका से बस पकड़ी। रास्ते भर दही हंडी की धूम ने बस का चलना मुश्किल कर दिया। डेढ़ घंटे में हम विलेपार्ले स्टेशन पहुँचे। यह बस का आखरी स्टॉप था। हम उतर कर पैदल चल पड़े। पापा कभी इस ओर आये नहीं थे। हमें विलेपार्ले से जुहू तक की दूरी का कोई अंदाजा न था। हम चलते रहे। रास्तों पर रास्ते बंगलों पर बंगले पीछे छूटते गए। पिताजी आगे-आगे मैं पीछे - पीछे। डेढ़ घन्टे इस गली से उस गली, उस गली से अगली गली तक बंगलों की ख़ाक छानते फिरने के बाद भी न तो बच्चन साहब का बंगला दिखा न बिहारी जी का मंदिर।

मैं पिछले दिन की भूखी थी। चलते - चलते तलवे घिस गए थे। चप्पल ने पैर काट लिया था। जगह - जगह फूंका पड़ गया था। अब पैदल एक कदम भी चलना मुश्किल हो रहा था। भूख- प्यास के कारण मेरी शक्ति जबाव देने लगी थी। पापा भी रास्तों में उलझ कर परेशान हो रहे थे। मैं कई बार पूछती,"और कितना चलना होगा?" पापा कुछ जानते, तो बताते। यहाँ आने की जिद मेरी थी इसलिए चुपचाप चलने में ही भलाई थी। किसी तरह हम मंजिल तक पहुँचे। सड़क पर दूर से ही भीड़ दिखायी पड़ गयी।भीड़ को चीरते हुए मंदिर के गेट तक पहुँचना लगभग असंभव था। ऐसे लगा जैसे सारी मुंबई इस समय यहीं उमड़ आयी हो! भीड़ की धक्कामुक्की और चिल्लाहट देख आगे बढ़ने की हिम्मत न हुई। हम कुछ देर वहीं खड़े भीड़ का चेहरा देखते रहे। मुझे जिस बात का डर था अगले कुछ पलों में वही हुआ। पापा ने कहा, "चलो घर। इन पागलों के बीच में घुस कर पागल बनने की कोई जरूरत नहीं।" 

मैंने उस सांवरे के लिए कल दिन भर व्रत रखा था आज सुबह से कुछ खाया भी नहीं ये सोच कर कि जिसे सीरियल में देखा उसे सामने से एक बार देख लूँ तो कुछ खाऊँ। मेरा वो सखा कोई साधारण इंसान तो था नहीं। इस समय वह यहाँ ईद का चाँद हो रहा था। इतनी दूर चल कर जिसके दर्शनों के लिए हम आये उसने भक्तों की भीड़ देख अपने किवाड़ बंद कर रखे थे। मेरे सब्र का बाँध टूट पड़ा। मैंने मन ही मन उस सांवरे से लड़ना शुरू किया, "तुम केवल अपने रूप से मोहन हो किंतु मन से पूरे काले हो। ये भी नहीं सोचते कि इतनी दूर से कोई तुमसे मिलने आया। कैसे ईश्वर हो तुम्हें किसी पर दया भी नहीं आती।"

बिना मिले लौटने का दुःख मुझे स्वाभाविक ही रुला गया। मुझे रोता देख पापा को मुझ पर दया आ गयी थी। उन्होंने कहा रोओ मत। एक बार कोशिश करते हैं द्वार के भीतर जा सके तो ठीक नहीं तो लौट चलेंगे।" मेरे लिए ये जीने मरने का प्रश्न था। नया-नया प्यार और ऊपर से ये भीड़भाड़। भीड़ में घुसते ही पापा और मैं अलग-थलग हो गए। मुझे आगे बढ़ने की चिंता थी और पापा को मेरी। भीड़ ने हमें उस किनारे पहुँचा दिया जहाँ से मंदिर का रास्ता खुलता था। हम वहाँ पहले से लगी किसी एकहरी लाइन का हिस्सा बन गए। मैं मंदिर की ओर बढ़ती रही और पापा मेरी ओर। उनके चेहरे पर गुस्सा साफ दिखाई दे रहा। उनका वश चलता तो मुझे खींच कर बाहर ले जाते किंतु भीड़ किसी का वश चलने दे तब न।

कुछ ही देर में द्वार खुला हम भीतर आहाते में प्रवेश कर गए। मेरी जान में जान आयी कि अब बिना मिले लौटना न होगा। अंदर ख़ूब आवाजें आ रही थी किंतु दिखायी कुछ न दे रहा था हम कपड़ों से बनी कृत्रिम गली से आगे किसी गुफा की ओर चलते चले जा रहे थे। अब रास्ता खुलेगा अब दर्शन होंगे सोचते हुए हम आगे बढ़ते गए।

बगल से आ रही आवाजें पीछे छूट गयी। गली हमें मंदिर के पीछे ले आयी थी। हम इस मंदिर में पहली बार आये थे। भगवान किस ओर हैं। कुछ भी पता न था। जो लोग हमारे आगे-पीछे थे वे हमें ऐसे देखते जैसे हमने कोई दोष कर दिया हो। रास्ते की थकान, धक्कामुक्की, रोष और आसुओं ने मेरी भली सी सूरत बिगाड़ने में कोई कसर न छोड़ी थी। हमें इस बात का अहसास हो रहा था कि कुछ गड़बड़ जरूर है किंतु क्या ये समझ में नहीं आ रहा था।

गली एक चमचमाते हॉल में खुली। हमने पाया कि हमारे साथ धोखा हो गया है। भगवान नहीं यहाँ पकवान का मेला लगा है। वहाँ तरह - तरह के लज़ीज पकवानों के स्टॉल लगे थे। लोग मनपसंद व्यंजन प्लेट में सजाते और खाते जाते। हम मेले में खोये दर्शनार्थी से किनारे खड़े अपने भगवान को खोजने लगे। चारों ओर की रौनक हमें मंत्रमुग्ध कर रही थी। पीछे से गुजरते हुए किसी आदमी ने सेवाधारी से कहा,"ये लोग बीच में घुस आये हैं।" उसका स्वर बता रहा था कि हमें अभी यहाँ से निकाल बाहर कर दिया जायेगा। मैंने लगभग रुआंसे स्वर में कहा," हम कहाँ आ गए? हमें नहीं पता। हमें तो भगवान का दर्शन करना है। मंदिर कहाँ है?"

जिन बातों से हम अनजान थे उसे सेवाधारी ने समझ लिया था। उसने हमें चुपचाप भोजन ग्रहण करने का सुझाव दिया। दर्शन के पहले खाना खाना मुझे कत्तई स्वीकार न था। मैंने दर्शन मार्ग बताने की जिद की। उसने दबे स्वर में समझाया 'पहले खा कर आओ फिर बताता हूँ" और हमें प्लेटें पकड़ा दी। भूख तो लगी ही थी हमनें बड़े संकोच से जो कुछ समझ में आया खा लिया। खाना उत्तम ही नहीं सर्वोत्तम था किसी फाइव स्टार होटल सा। भोजन के बाद भूख तो मिट गयी थी किंतु बाल सखा से मिलने की प्यास नहीं बुझी थी। मैंने करुण स्वर में कहा, "अब तो बता दीजिये भगवान से कैसे मिलना होगा?" मेरे भोले सवाल ने उसे कुछ अधिक तरल कर दिया था। उसने मुस्कुराकर कहा,"आपकी मासूमियत बता रही है कि आप पहली बार यहाँ आयी हैं और जब बिहारी जी भी यही चाहते हैं तो मैं भला आपको यहाँ से बाहर कैसे करता?"

दरअसल हम ग़लती से VIP गेस्ट की लाइन से भीतर आ गए थे। ये छप्पन भोगों से सजे बुफे उन लोगों के लिए थे जो मंदिर में सलाना हजारों - लाखों रुपयों का दान करते हैं। सेवाधारी के अनुसार गेट पर बिना पास के भीतर प्रवेश की ये गडबड़ी बिहारी जी की इच्छा बिना किसी भी कीमत पर संभव न थी। यहाँ कदम-कदम पर कड़ी सुरक्षा थी। बीच में खड़े सेवाधारी जगह - जगह भक्तों से पास दिखाने को कहते जाते आश्चर्य ही था कि हमसे किसी से कुछ नहीं पूछा था।

Very important person वाली लाइन में होने के नाते हमें पहले पाँच सितारा होटल सा खाना मिला फिर VIP कोटे से दर्शन। मुझे VIP दर्शन का मतलब भी मालूम न था। सेवाधारी हमें पीछे से मंदिर में भीतर ले गया कुछ ही कदम की दूरी से भीड़ का सामूहिक स्वर सुनाई देने लगा। हम श्री श्री राधा रासबिहारी के ठीक सामने आ कर खड़े हो गए। मैं किसी गवारिन सी बिहारी जी के सुसज्ज दरबार की प्रभुता में खो गयी। सामने युगल मूर्ति का अप्रतीम मोहक रूप और पीछे लाइन में अपरंपार जन सैलाब। लाइन में लगे लोग एक झलक पा कर आगे कर दिए जाते। सेवाधारी लगातार 'चलते चलो, आगे बढ़ो' करते जाते। हम VIP से खड़े बेरोक-टोक देर तक युगल मूर्ति की मोहिनी निहारते रहे।

मोर मुकुट, कमल नयन, सावरी सूरत, मोहनी मूरत, सुनहली बाँसुरी, होठों पर मंद - मंद मुस्कान। मैंने ईश्वर को पहली बार इतने करीब से देखा था। क्या कुछ नहीं कहा था मंदिर के बाहर खड़े हो कर..., और वे थे कि सामने खड़े मेरी चुटकी ले रहे थे, "इतनी दूर से आई हो, मेरे लिए कल से भूखी भी हो, मैं कहाँ भागा जा रहा हूँ? इसलिए कहा पहले कुछ खा लो, शीतल हो लो, तो मिलो। कहो..., कुशल से तो हो न?"

होठों से शब्दों का नाता टूट चुका था। आँखों से आसुओं की अविरल धारा बहती चली जा रही थी। सामने खड़े कृष्ण अपनी रूप माधुरी से मेरी सारी कटुता, सारा रोष, सारी पीड़ा हर चुके थे।

#जयश्रीसिंह, मुंबई

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