विचार : वस्तु, विज्ञापन और धोखा
संध्या को कहाँ पता था कि डायपर में लिपटा उसका दस माह का शिशु चैन की नहीं, मौत की नींद की ओर बढ़ रहा है। वह आदतन उसे डायपर पहनाकर ऑफिस चली जाती। शाम को घर लौटते ही उसे बदल देती। सोने से पहले फिर नयी डायपर बाँध कर दोनों की नींद के लिए निश्चिन्त हो जाती। कल सारी रात वह चिढ़ - चिढ़ाता रहा। नींद किसी की नहीं हो पायी थी। एक पल उसे लगा कि आज उसे घर पर ठहर जाना चाहिए।
'जिस दिन कुछ जरूरी काम हो उस दिन तुम्हारा बच्चा बीमार हो जाता है' मशीनी सभ्यता का यह हृदयहीन संवाद कमोबेश उसे काम पर खींच ले गया फिर आज पति ने छुट्टी ले ली है वे घर पर ऑनलाइन रहकर अपना काम मैनेज लेंगे और उसे देख भी लेंगे यह सोच कर वह निकल पड़ी।
घन्टों बाद भी बच्चा नहीं जगा, रवि को चिंता हुई। उसने झटपट डॉक्टर की अपॉइन्मेंट ली और उसे लेकर हॉस्पिटल पहुँचा। स्थिति नाजुक बताते हुए डॉक्टर ने तुरंत शिशु को एडमिट कर लिया। कुछ ही देर बाद सन्ध्या को पता चला कि उसका बच्चा इस दुनिया में नहीं रहा। डॉक्टर ने बताया कि डिसेन्ट्री में उसके शरीर का सारा पानी निकल गया है।
चार सालों की डॉक्टरी दौड़ के बाद मिली संतान वाले इस नये नवेले माँ - बाप ने सपने में भी नहीं सोचा था कि सुख की नींद देने वाला वह डायपर उस नन्हें का जीवन सोख कर उन्हें धोखा भी दे सकता है।
सुबह दो लेक्चर के बाद चाय की टेबल पर हुई इस चर्चा ने हम सब को बुरी तरह झकझोर दिया। कितनी लापरवाह है वो माँ जिसने बच्चे को डायपर के हवाले छोड़ कर अपने आप को निश्चिन्त कर लिया था।
किंतु दोष क्या अकेली संध्या का ही था? वह उत्पाद कंपनी और उनका वह ज्ञानधारी विज्ञापन उस मासूम की मौत का जिम्मेदार नहीं जो थकी-हारी कामकाजी माँओं को चैन की नींद का झाँसा दे रहा है? क्या वर्क प्लेस पर दिन ब दिन काम का बढ़ता बोझ इन लापरवाहियों का कारण नहीं, जो स्त्री को माँ या पत्नी होने से अधिक कर्मचारी होने का एहसास करा रहा है? क्या शहर में जीना, कमाना, परिवार में बच्चे और बूढ़ों का ख़याल रखना तथा सही समय पर दवाब मुक्त निर्णय ले पाना आसान है?
शहर नौकरी देता है, पैसा देता है, सूनी गोद वालों को किलकारी के सपने देता है। इन सब की बराबरी में खड़ा बाजार वस्तुओं की फ़ौज खड़ी कर हमें नींद और आराम का आश्वासन भी दे दे रहा है किंतु कौन जाने इन सब के बीच कौन किसे धोखा दे रहा है? संध्या बेहोश है। घंटों बाद भी उसे होश नहीं आ पाया है।
तीसरे लेक्चर की घन्टी के साथ हमारी चर्चा हजारों सवालों के साथ अवचेतन के सुपुर्द हो गयी। मैं संध्या से सीधे - सीधे परिचित नहीं हूँ किंतु अपने शहर की एक कामकाजी स्त्री की स्थिति और उसकी कारुणिक क्षति के कारणों को ढूँढने में अपना चैन - सुकून खो बैठी हूँ।
'जिस दिन कुछ जरूरी काम हो उस दिन तुम्हारा बच्चा बीमार हो जाता है' मशीनी सभ्यता का यह हृदयहीन संवाद कमोबेश उसे काम पर खींच ले गया फिर आज पति ने छुट्टी ले ली है वे घर पर ऑनलाइन रहकर अपना काम मैनेज लेंगे और उसे देख भी लेंगे यह सोच कर वह निकल पड़ी।
घन्टों बाद भी बच्चा नहीं जगा, रवि को चिंता हुई। उसने झटपट डॉक्टर की अपॉइन्मेंट ली और उसे लेकर हॉस्पिटल पहुँचा। स्थिति नाजुक बताते हुए डॉक्टर ने तुरंत शिशु को एडमिट कर लिया। कुछ ही देर बाद सन्ध्या को पता चला कि उसका बच्चा इस दुनिया में नहीं रहा। डॉक्टर ने बताया कि डिसेन्ट्री में उसके शरीर का सारा पानी निकल गया है।
चार सालों की डॉक्टरी दौड़ के बाद मिली संतान वाले इस नये नवेले माँ - बाप ने सपने में भी नहीं सोचा था कि सुख की नींद देने वाला वह डायपर उस नन्हें का जीवन सोख कर उन्हें धोखा भी दे सकता है।
सुबह दो लेक्चर के बाद चाय की टेबल पर हुई इस चर्चा ने हम सब को बुरी तरह झकझोर दिया। कितनी लापरवाह है वो माँ जिसने बच्चे को डायपर के हवाले छोड़ कर अपने आप को निश्चिन्त कर लिया था।
किंतु दोष क्या अकेली संध्या का ही था? वह उत्पाद कंपनी और उनका वह ज्ञानधारी विज्ञापन उस मासूम की मौत का जिम्मेदार नहीं जो थकी-हारी कामकाजी माँओं को चैन की नींद का झाँसा दे रहा है? क्या वर्क प्लेस पर दिन ब दिन काम का बढ़ता बोझ इन लापरवाहियों का कारण नहीं, जो स्त्री को माँ या पत्नी होने से अधिक कर्मचारी होने का एहसास करा रहा है? क्या शहर में जीना, कमाना, परिवार में बच्चे और बूढ़ों का ख़याल रखना तथा सही समय पर दवाब मुक्त निर्णय ले पाना आसान है?
शहर नौकरी देता है, पैसा देता है, सूनी गोद वालों को किलकारी के सपने देता है। इन सब की बराबरी में खड़ा बाजार वस्तुओं की फ़ौज खड़ी कर हमें नींद और आराम का आश्वासन भी दे दे रहा है किंतु कौन जाने इन सब के बीच कौन किसे धोखा दे रहा है? संध्या बेहोश है। घंटों बाद भी उसे होश नहीं आ पाया है।
तीसरे लेक्चर की घन्टी के साथ हमारी चर्चा हजारों सवालों के साथ अवचेतन के सुपुर्द हो गयी। मैं संध्या से सीधे - सीधे परिचित नहीं हूँ किंतु अपने शहर की एक कामकाजी स्त्री की स्थिति और उसकी कारुणिक क्षति के कारणों को ढूँढने में अपना चैन - सुकून खो बैठी हूँ।
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