विचार : धर्म, धंधा और गाय
आजकल हरे मटर का सीज़न चल रहा है। घर - घर निमोना, घुघुरी बन रही है। स्टफ़ पराठों में भी मटर की पूड़ियाँ पूछी जा रही है। गाँव तो गाँव शहरों में भी हर हर दो दिन में पाँच - पाँच किलो छिम्मी छील - छील कर अगले चार - छः महीनों के लिए फ़्रिज में स्टोर किये जाने का कार्यक्रम जोरों पर चल रहा है। छिम्मी छीलते - छीलते माँ को अक्सर गाँव की याद हो आती है। माँ बताती हैं कि गाँवों में छिम्मी के छिलके पशुओं की हौदी में डाल दिए जाते हैं। सानी - पानी के साथ मिले कोमल छिलके द्वार पर बँधे पशु बड़े चाव से खा लिया करते हैं।
यहाँ शहरों में तो कूड़ा भी गीला कचरा - सूखा कचरा के चक्रव्यूह में फँसा हुआ है और ऐसे ही कुचक्रों में उलझी है मंदिरों के बाहर किराये पर बँधी गाय। शहरों में बैल और भैंस तो दुर्लभ जीव हैं किंतु धर्म और धंधे के खूँटे में बँधी गाय यदा - कदा मंदिर, उद्यान, ओपन जिम या वाकिंग एरिया के आस - पास सहज ही देखने को मिल जाती है। गायों को इन जगहों तक पहुँचाने की सुविधा इसलिए ताकि वार के नाम पर आप दौड़ लगाते - लगाते या व्यायाम करके घर निकलते दान - धर्म करते हुए जाएँ वर्ना ऑफिस टाइम पर कहाँ आपको गाय को चारा खिलाने और पूण्य कमाने के विषय में सोचने की फुर्सत मिल पायेगी। अतः ऑनलाइन शॉपिंग और फ्री होम डिलेवरी वाली सुविधा की तर्ज पर सबेरे आपके घर के आस - पास टेंपररी बेसिस पर पूण्य दायिनी गाय माता भी बँधी मिल जाया करेगी।
ऐसे में गाय को देखकर यदि इस सीज़न में आपके भीतर का दयालु ग्रामीण जाग उठे और आप अपना पशु प्रेम दर्शाने के लिए पाँच किलो छिलके ले कर गाय माता के पास पहुँच जाएँ तो भी उसे खिला नहीं पाएँगे। गाय के पास बैठी दो घंटे वाली मालकिन आँख तरेर कर कह उठेगी।
'ओ भाऊ! ये गाय ये सब नहीं खायेगी।'
'कैसे नहीं खायेगी? पालतू पशु ये सब खाते हैं।'
'ये पशु नहीं है। गाय है गाय। इसे खिलाने का मतलब है पूण्य कमाना और पूण्य की क़ीमत है दस रूपये। अर्थात वो गाय दस रुपयों में उसी मालकिन के द्वारा बेचे गये भूसे के लड्डू या घास ही खायेगी। वह आपके द्वारा लाया हुयी रोटी या गुड़ नहीं खायेगी क्योंकि यदि रोटी गुड़ खा कर उसकी आदत बिगड़ गयी तो वह घास नहीं खायेगी।
कुलमिलाकर वह देवतुल्य गाय केवल वही खायेगी जिसमें उसकी मालकिन को धन लाभ होगा। ये भी संभव है कि आप लड्डू या घास खरीद कर उसे खिलाएं लेकिन हाजमा ख़राब होने के कारण वह आपसे मुँह फेर ले। ऐसे में भले हमारे दस रूपयों के लड्डू वेस्ट होते जाये किंतु मालकिन खुश कि गाय के मालिक को दो घंटे का किराया देने के बाद उसकी अपनी कमाई भर पैसे निकल आये हैं।
और यदि इन सबके बाद भी आपका गाय को छिलके खिलाने शौक़ न उतरा हो तो छिलके की गठरी वहीं किनारे रख जायँ। जब धंधे का समय खत्म हो जायेगा तो वह स्वयं उसे खिला देगी क्योंकि यदि इस समय उसने छिलके खा लिए तो औरों के ख़रीदे लड्डू नहीं खायेगी और यदि लड्डू नहीं खायेगी तो उस दिन के धंधे का क्या होगा?
बेचारी गाय! धर्म और घंधे के बीच फँसी जाने क्या - क्या सोचती होगी! जाने किसने उससे किस जन्म का बदला लिया? उसे पाप - पूण्य के चक्कर में फँसा कर धर्म के घंधे में जोड़ दिया है।
डॉ. जयश्री सिंह, मुंबई
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