डायरी : एक प्राध्यापक की डायरी (पृष्ठ - २)
'दिवाली आ रही है घर की सफाई कब होगी?'
पिछले कुछ दिनों से ये सवाल कई बार पूछा जा चुका था। परीक्षा ड्यूटी, जाँच कार्य, रचनात्मक लेखन के साथ कहीं न कहीं आने-जाने की व्यस्तता में एक-एक दिन बीता जा रहा था। छुट्टी पड़े तो मैं भी मदद करूँ सोचते हुए वर्किंग डेज़ निकलते जा रहे थे।
पिछले दो दिनों से कॉलेज से यूनिवर्सिटी, युविनर्सिटी से चर्चगेट और फिर वहीं से प्रकाशक के यहाँ चक्कर लगाने में एकदम थक गयी। दोनों दिन घर पहुँचने में लगभग रात के नौ- दस बजे। रविवार के दिन थके हुए तन के साथ बेचारा मन भी पूरे दिन चुपचाप पड़ा रहा। आज सुबह तैयार हो कर निकलने लगी तो माँ बोली, 'अब, आज कहाँ?'
'कॉलेज जा रही हूँ।'
'कॉलेज अभी बंद नहीं हुआ?'
'नहीं। आज आखरी दिन है। कल से छुट्टी।'
'ठीक है। जल्दी आ जाना। आज लड्डू बनाना है।'
'लड्डू...?'
लड्डुओं का नंबर तो सफाई के बाद आता है न? सफाई पूरी हो गयी क्या? पूछने में कोई हर्ज नहीं था पर पूछना खतरे से खाली भी नहीं था। ज्यादा कुछ नहीं निकलने से पहले माँ द्वारा एक जोरदार लेक्चर मिल जाता! लड्डुओं ने जाहिर कर दिया था कि सफाई हो चुकी है इसलिए कुछ पूछने का कोई मतलब नहीं था। सवाल को मन में रोके मैं कॉलेज के लिए निकल आयी यह सोचते हुए कि आज जल्दी आकर अपना किताबखाना साफ कर दूँगी। व्यस्तता के नाते एक गिल्टी फीलिंग मन में सदा बनी रहती है। मैं अपने हिस्से का काम करके उस गिल्ट को कम कर देना चाहती थी।
कॉलेज के पहले और आखरी दिन अक्सर ही कॉमन स्टाफ़ मीटिंग हुआ करती है। आज भी हुई। अगले सत्र के कार्यक्रम की योजनाएँ, आगे ली जाने वाली प्रतियोगिताएँ, अंतरराष्ट्रीय सेमिनार, कॉलेज उत्सव और विशेष रूप में एकेडेमिक ऑडिट के लिए किये जाने वाले कार्यों की हिदायतों के साथ सभा समाप्त हुई। इसके बाद दोपहर तक कॉपियाँ जाँची गयीं। प्रोजेक्ट के मार्क्स भरे गए। आज सत्र का आखरी दिन था इसलिए सारे जरुरी काम आज ही निपटाये गए। ये सब करने में दोपहर के दो बज गए। जोरों की भूख लग गयी। भूख के साथ घर और घर के साथ माँ की बात याद हो आयी।
आज घर जल्दी जाना है कहते हुए सबको दीपावली की शुभकामनाएँ दी - ली। निकलते - निकलते बायोमेट्रिक पर तर्जनी छुआयी मशीनी स्वर में धन्यवाद सुना और गाड़ी ले कर घर चली आयी।
घर में कदम रखते ही दिवाली के आगमन का एहसास हुआ। पूरा घर बेसन के लड्डुओं की मीठी ख़ुश्बू से महक रहा था। द्वार पर रंगोली सजी हुई थी। तोरण लगाये जा चुके थे। किचन में देखा माँ और बहनें मिलकर लड्डू बना रहीं हैं। घर के माहौल ने मेरा पूरा मूड बदल दिया। मैं उत्सुकतावश बोल उठी।
'अरे! माँ! इसबार ये दिवाली की तैयारी इतनी जल्दी क्यों?'
'जल्दी कहाँ? आज धनतेरस है।'
'आज धनतेरस है? लेकिन आज तो हमारा कॉलेज था।'
'कॉलेज के अलावा तुम्हें और याद भी क्या रहता है?'
माँ अपनी बात कहकर खाली हो गयी किंतु 'धनतेरस के दिन तक कॉलेज चला?' ये सोचकर मेरा मन ठगा - ठगा सा महसूस करने लगा। कुछ सालों पहले धनतेरस से पहले छुट्टी पड़ जाया करती थी इसबार धनतेरस के दिन भी..., तब वो दिन दूर नहीं कि जब दिवाली के दिन भी कॉलेज जाना पड़े!
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें