रिपोर्ट : साहित्यकारों का आत्मीय मिलन और पीढ़ियों के सुसंवाद


इन दिनों मुंबई में आदरणीय नरेंद्र मोहन जी की उपस्थिति और संयोग से कश्मीरी कवि अग्निशेखर जी के मिल जाने से कल ठाकुर विलेज के 'हाई ऑन टी' कॉर्नर में चाय पर चर्चा का छोटा- सा एक कार्यक्रम बन गया।

पिछले शनिवार मुंबई, माटुंगा के मैसूर एसोसिएशन सभागार में मंटों पर हुए एक कार्यक्रम में आदरणीय डॉ. नरेंद्र मोहन जी मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। 'मंटो की जीवनी' और उनके रचनात्मक अनुभवों को उनसे सुनना हमारी कल की चर्चा का केंद्रीय विषय रहा। बात मंटो से शुरू हो कर सांप्रदायिक परिस्थियों से होते हुए विभाजन की त्रासदी तक गयी और बातों ही बातों में कश्मीर विस्थापन और आर्टिकल 370 के गंभीर समस्याओं तक विस्तार लेती चली गयी।

अग्निशेखर जी ने कश्मीर से हिंदुओं के विस्थापन की त्रासदी का खुल कर वर्णन किया। उन्होंने बताया कि हिन्दू जो कश्मीर में अल्पसंख्यक हैं उन्हें लोग अल्पसंख्यक मानने को तैयार नहीं। विस्थापन के तीस वर्षों बाद आज का जम्मू पूरी तरह से वृद्धाश्रम में परिवर्तित होता जा रहा है। सालों से वहाँ के युवाओं के लिए रोजगार के एक भी अवसर उपलब्ध नहीं कराये गए। ऐसे में कश्मीर छोड़ दिल्ली, मुंबई, पुणे जैसे शहरों में जा बसे युवा क्या कभी कश्मीर लौटने के विषय में सोच पाएँगे?

1990 में कश्मीर से हिंदुओं का ये विस्थापन विश्व का सातवाँ बड़ा विस्थापन है। पिछले 29 सालों में जितना कश्मीर के विस्थापितों ने इस त्रासदी पर लिखा (उनकी सूचनानुसार पिछले 29 सालों में कश्मीर विस्थापिन पर 400 से अधिक किताबें प्रकाश में आ चुकी हैं।) उतना भारत - पाकिस्तान के विभाजन पर भी नहीं लिखा गया जबकि उस दौर में करोड़ों लोग विस्थापित हुए और लाखों लोग मारे गए। (जो लिखा भी गया वो अधिकतर पंजाबी और सिंधी के लेखकों द्वारा ही लिखा गया।)

ये एक प्रकार की रचनात्मक क्रांति ही है कि आज कश्मीर का लगभग हर विस्थापित हृदय अपने भोगे हुए यथार्थ को कथ्य और शिल्प में पिरोकर अभिव्यक्त कर देना चाह रहा है। इस बीच कश्मीर में कितनी राजनैतिक पार्टियाँ आयीं और अपने - अपने तरह की सीख पढ़ा कर चलती बनीं। सत्ता चाहे जिस किसी की रही किंतु कश्मीर आज भी आर्टिकल 370 के जकड़न से बाहर नहीं निकल पाया। इस पर विजय कुमार जी ने विश्व राजनीति की बात करते हुए बड़े दुःख के साथ यह कहा कि सत्ता चाहे किसी पार्टी की हो किंतु हर देश - काल में सत्ता का चरित्र और उसका चेहरा हर कहीं एक सा दिखायी पड़ता है।

डॉ. नरेंद्र मोहन जी ने भी अपनी लाहौर यात्रा और वहाँ उनके पैतृक घर में इस समय रह रहे राँची के एक मुस्लिम परिवार की आत्मीयता का जिक्र किया। नरेंद्र मोहन जी विभाजन के समय महज 12 वर्ष के बालक थे। दंगा- फ़साद, मारकाट और रक्तपात की घटनाओं को उन्होंने बहुत निकट से देखा है। लाहौर से उजड़ कर यहाँ आना आज भी उनकी चेतना में गहरे पैठा हुआ है। इस बीच वे दो बार लाहौर जा चुके हैं। अपने निजी अनुभवों से उन्होंने बताया कि दो देशों की साधारण जनता के बीच आज भी एक दूसरे के प्रति लगाव और जिज्ञासा है। घृणा का सारा खेल सिर्फ और सिर्फ राजनीतिक है। मानव नियति के प्रश्न राजनीति खेल से कई गुना बड़े होते हैं। मंटो को इन्हीं अर्थो मे समझने की आवश्यकता है।

एक और बात जो उनसे सुनना अच्छा लगा कि पुरानी पीढ़ी का यह फ़र्ज़ है कि युवा पीढ़ी को अधिक से अधिक समझा जाये। उनका यह मानना है कि समस्त निराशाओं के बावजूद आज भी  बहुत सार्थक काम हो रहा है और वह आगे भी होता रहेगा। उस पर ध्यान दिये जाने की आवश्यकता है। यही सकारात्मकता हमारे काम की है।

पीढ़ियों के बीच बढ़ रही दूरी और संवादहीनता पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि वे स्वयं नयी पीढ़ी की रचनाओं को पढ़कर उनसे तादात्म्य स्थापित करने का प्रयास करते हैं। उन्होंने कहा कि किसी की रचना को पढ़ना ही उस रचनाकार से जुड़ना है। वे पूरी विनम्रता से नए-पुराने रचनाकारों से जुड़ने की बात करते रहे। उनके अनुसार कोई भी साहित्य नई पीढ़ी से विलग होकर रचा नहीं जा सकता। अस्सी पार कर चुके एक प्रबुद्ध और वरिष्ठ लेखक से जीवन के उमंग और सकारात्मकता को पाना हमें सचमुच एक नयी ऊर्जा से भर गया।

मधु काँकरिया जी ने चर्चा में हिस्सा लेते हुए एक बेहद दिलचस्प बात कही। उन्होंने कहा कि रचनाकार में लगातार एक प्रकार की बेचैनी बनी रहनी चाहिए। यही बेचैनी उसे सार्थक सृजन के लिए प्रेरित करती है। फेसबुक जैसा मंच कई बार उस बेचैनी को लाइक - कमेंट की सस्ती लोकप्रियता से सन्तुष्ठ कर देता है। लेखक के लिए यह भी एक प्रकार का खतरा ही है। अतः इस मंच से जुड़ी पीढ़ी को इससे संतुलन बना कर चलने की आवश्यकता है।

मैं भी अपने अनुभव और अध्ययन के आधार पर छोटे - छोटे सवालों के जरिये इस चर्चा में हिस्सा ले सकी। पाँच लोगों की इस छोटी सी बैठक में साहित्य की चार पीढ़ियाँ उपस्थित रहीं। नयी पुरानी पीढ़ी के बीच चल रहे इस आत्मीय संवाद में दो घन्टे कब निकल गए पता ही नहीं चला। एक कप चाय में चीनी की तरह घुली मिली यह चर्चा हमारी स्मृतियों में मध्यम मिठास घोल गयी।

मुम्बई की तमाम असुविधाओं, दूरियों, इतवार के दिन लोकल ट्रेनों के मेगा ब्लॉक के बावजूद ठाणे से कूदते - फांदते कांदिवली तक जाने और रात दस बजे किंचित थके - मांदे घर लौटने के बाद भी आज एक अजीब सी स्फूर्ति और ताज़गी से भरा हुआ महसूस कर रही हूँ। काश! ऐसी सार्थक बैठकें नियमित अंतराल से होती रहें....!

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