संस्मरण : मैं होली नहीं खेलती
मुंबई में वैसी होली खेली भी नहीं जाती जैसी कि उत्तर भारत में। यहाँ होली सुबह से दोपहर तक अर्थात कुल आधे दिन का खेल होती है। जब हम छोटे थे तो मोहल्ले के सारे बच्चे एक - दूसरे पर पिचकारी से रंगों की बौछार करके खुश हो लेते। घंटे-दो-घंटे में पिचकारी के इस खेल से हमारा मन भर जाता। कपड़े भीग जाते। गीले कपड़ों में कंपकपी आने लगती तब माँ हमें नहला कर साफ कपड़े पहना देती और हमारी होली मन जाती। शाम को पापा के मित्र या मम्मी की कुछ सहेलियाँ घर आतीं, वे एक दूसरे को रंग का टीका लगाते, मिठाइयों का आदान प्रदान होता, वे आपस में हँसते - बतियाते और होली का यह अजीब सा त्योहार पूरा हो जाता। पिचकारी से भिगो देने वाली वह प्यारी सी होली मेरे बालमन को बहुत भाती।
बचपन बीता। जिस दिन होली के रंगों ने पिचकारी की सीमा पार कर मेरे गालों को छुआ, उसी दिन से मैंने होली खेलना छोड़ दिया।
होली के दिन लोग क्या-क्या नहीं करते। मुँह पर रंग पोतते हैं। (कई बार कीचड़ या ऑयल पेंट भी) बाल्टी भर रंग उड़ेल देते हैं। उठा कर पानी की टंकी में फेंक देते हैं। कुछ मौका परस्त लोग तो इस त्योहार के बहाने और भी कई तरह के फायदे उठा लेने में माहिर होते हैं। मैं भी होली को रंगों का त्योहार मानती थी किंतु इसकी खेलायी से अवगत हो जाने के बाद इससे बदरंग मुझे दूसरा कोई त्योहार नहीं लगा। जब तक हम छोटे थे, पिचकारी खेलने की जिद करते थे। अब तो याद भी नहीं कि आखरी होली कब खेली थी।
पाँच साल पहले एक कोर्स के लिए नैनीताल गयी थी। कोर्स पूर्ण कर सुबह चार बजे दिल्ली लौटी। मुंबई की ट्रेन देर रात की थी। हमने सोचा क्यों न दिन में वृन्दावन जा कर बाँके बिहारी का दर्शन कर लें। होली को दो दिन बाकी थे। पहली बार होली के समय मैं उत्तर प्रदेश में थी और वो भी वृन्दावन में। रास्ते भर लोग अबीर - गुलाल उड़ाते दिखे। रास्ते और गलियाँ क्या मंदिर के प्रांगण तक में रंगों से बचने का कोई उपाय न दिखा।
मैंने पहली बार मंदिर के प्रांगण में रंगों का वह उछाह देखा था। क्या भक्त, क्या पुजारी और क्या भगवान! मंदिर के सेवाधारी दो - दो मिनट में थाली भर - भर कर पीला - गुलाबी - हरा रंग उड़ा देते। मैंने सिर से दुपट्टा खींच कर अपना चेहरा ढाँक लिया। उसके बाद तो मंदिर के द्वार से लेकर मथुरा स्टेशन तक जिस - जिस ने मुझे दुपट्टे की ओट में छुपा देखा हर उस मथुरा - वृन्दावन वासी ने मुझ पर गुलाल उड़ेला। स्टेशन तक पहुँचने भर में मुंबई की गुड़िया रंगों की पुड़िया दिखने लगी।
बचपन से अब तक जिन रंगों से खुद को इतना बचाया, उस दिन उतने ही रंगों ने लिपट कर मुझसे अपना बदला चुकाया।
किसी ने मुझे स्पर्श नहीं किया, न रंग पोता, न मला और न ही मैंने होली खेली। फिर भी उस रंगीले की नगरी की फिजाओं में घुले-मिले रंगों ने मुझे सिर से पैर तक सराबोर कर दिया। फगुआ का रंग होता तो दो चार दिन में उतर जाता किंतु मेरे कोरे मन पर उस दिन बिहारी जी का जो रंग चढ़ा वो आज तक न उतर पाया।
ऐसी होली का मुझे सदा इंतजार रहेगा।
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