रिपोर्ट : साहित्यकारों के साथ एक शाम

अपने समय के कितने साहित्यकारों से हम परिचित हैं? अपने कितने समकालीनों से घंटों बैठ कर हमने बातें की हैं? उनमें से कितने हमारे करीबी मित्र बने हैं? हमने अपने अलावा और किस - किस को पढ़ा है, किस - किस के साहित्य पर खुल के चर्चाएँ की हैं? इन सवालों ने मुझे कल इतना उद्वेलित किया कि पवई से लौटते हुए कांजुरमार्ग से मैंने कौन सी ट्रेन ली, रात सवा दस बजे स्टेशन के बाहर लंबी लाइन में लगकर कुल कितने मिनट ऑटो का इंतजार किया। इन बातों का मुझे ध्यान ही नहीं रहा।

कल शाम कथाकार मधु काँकरिया जी के घर आदरणीय कवि राजेश जोशी जी, विजयकुमार जी, अनूप सेठी जी की आत्मीय बैठक में सत्तर के दशक के नवोदित (अब प्रसिद्ध) कवियों - कथाकारों के व्यक्तित्त्व और उनकी रचनों की इतनी अलिखित दास्तानें सुनी जिन्हें अब तक के अध्यापकीय अनुभव में न किसी मंच पर सुना था और न ही कभी जाना।

शीर्ष के साहित्यकारों के बीच श्रोता बनकर चार - पाँच घंटे की गपशप में मैंने जाना कि हमारे वरिष्ठ साहित्यकारों के बीच किस प्रकार के मैत्री संबंध रहे? ये जान कर ताज्जुब हुआ कि वे जब जिस शहर पहुँचे उस शहर के साहित्यकारों ने हृदय से एक दूसरे का स्वागत किया। उन्होंने मिल बैठ कर घंटों साहित्यिक चर्चाएँ कीं। सत्तर के दशक के उत्तरार्ध में उभरे और अस्सी के दशक में अपनी पहचान बना चुके साहित्यकारों ने कितने डूबकर एक - दूसरे की रचनाएँ पढ़ीं, उन्होंने एक-दूसरे के साहित्य पर खुल कर चर्चाएँ कीं, एक दूसरे को सम्मान दिया, जहाँ आवश्यक था खुलकर आलोचना भी की और इस प्रकार कई-कई बार की मुलाकातों ने उनके बीच गहरे मैत्री संबंध स्थापित किये। उन्होंने अपने समकालीनों के व्यक्तित्त्व और उनकी रुचियों के विषय में कितना कुछ जाना। उनके पास एक दूसरे से जुड़े कितने - कितने अद्भुत, अविस्मर्णीय संस्मरण हैं।

एक ओर जहाँ मैं इन चर्चाओं का आनंद लेती रही वहीं दूसरी ओर एक सवाल मुझे लगातार कुरेदता रहा कि हमने अपने समकालीनों को कितना पढ़ा है? एक दूसरे के विषय में हम कितना जानते हैं? हम अपने आने वाली पीढ़ियों तक कौन सी स्मृतियाँ पहुँचाएँगे? हमारे समय में मिलने - जुलने, बोलने - बतियाने, एक दूसरे के व्यक्तित्त्व को जानने - समझने अथवा अपना साहित्य छोड़कर दूसरों के साहित्य को पढ़ने की परंपरा ही नहीं है फिर हम अपने नवोदितों को क्या देंगे? कोई पूछ लेगा तो क्या बताएँगे?

हमारे समय में हर किसी के पास समय की कमी है। ऐसे समय में सोशल मिडिया के प्रचलित मंचों का कितना सदुपयोग कर रहे हैं हम? इन मंचों पर अब तक हमने कितनी सार्थक चर्चाएँ की? इस सशक्त साधन को कितना वैचारिक बना पाये हम? हमपर अक्सर ये आरोप लगे कि हमने इसे आत्मप्रचार, आत्ममुग्धता का साधन बना दिया है। क्या सच में हमारी पीढ़ी को साहित्यिक मित्रों की आवश्यकता नहीं है? क्या हम अपने फॉलोवर्स से ही सन्तुष्ठ हो कर रह जायेंगे?
इन बातों पर गहराई से सोचने की आवश्यकता है।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

कविता - होने का सबूत

कहानी : अंतहीन

कविता : समय के पार कविता