डायरी : एक प्राध्यापक की डायरी (पृष्ठ -१)


याद नहीं कि कभी किसी प्राध्यापक की डायरी सरेआम हुई हो!

प्राध्यापक बड़ा सतर्क जीव होता है अपने ठाट - बाट से लेकर अपने काम- काज तक बिलकुल फाउंटेन पेन सा ख़ास। अपनी निजी डायरी के पन्ने वह कभी सार्वजनिक नहीं कर सकता। फिर भी, अपनी डायरी के कुछ पन्ने प्रस्तुत कर रही हूँ -

लगातार चार लेक्चर लेने के बाद (120 युवाओं से भरी क्लास में लगातार चार घंटे बोलने के बाद) फेफड़ों से लेकर पेट की अंतड़ियाँ तक जबाव दे गयी थी। छोटे बच्चों को वर्ण उच्चारण में कितनी मेहनत लगती होगी इसका दर्द प्राध्यापक से बेहतर कौन समझ सकता है। पानी पी-पी कर बोलते रहने के बाद भी गला सूख कर काँटे की तरह चुभने लगा था। मुँह से एक शब्द निकालना स्वरतंत्र निकाल कर रख देने जैसा दर्ददायी लगने लगा। चौथी बेल हो चुकी थी। मेरे प्राध्यापकीय जीवन के सबसे सन्तोषजनक क्षण इसी बेल के बाद समाप्त हो जाया करते हैं। इसके बाद दिन की गाड़ी दूसरे गेयर में पहुँच जाती है।

दो फ्लोर चढ़कर ऊपर स्टाफ रूम की ओर पहुँची कि दरवाजे पर 2-3 विद्यार्थियों ने घेर लिया। पिछले कई दिनों से कक्षा में रिसर्च प्रोजेक्ट का मार्गदर्शन कर रही थी और ये हैं कि एक दिन भी उपस्थित न रह सके। (नौकरी और घर की जिम्मेदारी के चलते कुछ विद्यार्थी नियमित कक्षाओं में उपस्थित नहीं हो पाते। इस बात में कितनी ईमानदारी है वे ही जाने किंतु हमारा सहयोगी मन उनकी कहानियों से अक्सर ही द्रवित हो जाया करता है) अब जब प्रकल्प जमा करने का समय है तो आज अचानक प्रकट हो कर प्रकल्प का विषय माँग रहे हैं।

'दो मिनट खड़े हो कर विषय बता भी दूँ तो मार्गदर्शन के बिना ये लिखेंगे कैसे? थोड़ा-बहुत तो समझना ही पड़ेगा।' उनसे दस मिनट इंतजार करने को कहकर मैं अपने टेबल पर चली आयी।

सुबह का चाय-बिस्किट अपने हिस्से की जिम्मेदारी निभा कर कपूर हो चुका था। इस समय 11:15 बज रहे थे यदि अब कुछ न खाया जाये तो घर से लाया टिफिन घर जा कर ही खुल पायेगा। इस समय खाने पर साथ देने वाला भी कोई नहीं दिखा। पूछने पर पता चला कि प्राची (इतिहास Dept), सुजाता (भूगोल Dept) और सुधा (समाजशास्त्र Dept) लेक्चर से सीधे मीटिंग में चली गयी हैं। अंजू (मराठी Dept) और टीना (अंग्रेजी Dept) NSS की टीम लेकर पीछे कैम्पस में ट्री प्लांटेशन अभियान में जुटी हुई हैं। मोहिनी (संस्कृत Dept) अपने योग अभ्यास कक्ष में अकस्मात आये कुछ अतिथिओं से चर्चा करने में व्यस्त हैं।

मुँह में एक निवाला रखा नहीं कि दस काम दिमाग में दौड़ने लगे। एक्टिविटी की फ़ाइल अपडेट करनी है। सोमवार के कार्यक्रम की सूचना बनानी है। उससे पहले अपने कमिटी की मीटिंग लेनी है। कीर्ति मॅडम दो दिन से competition की रिपोर्ट पूछ रही हैं आज कुछ भी करके समाचार वालों को रिपोर्ट भेजनी है।

फ़ोन देखा तो सीजीसी कॉलेज से मधुलिका के दो मिस्ड कॉल। ये जानकर कि मैं लेक्चर में होऊँगी उसने SMS भेज दिया था "आज शाम कार्यक्रम में आ रही हो न! देखो संचालक की जिम्मेदारी तुम्हें ही निभानी है। चली आना बस।"

खाते-खाते Whatsapp पर जैसे उलझ कर रह गयी। दूसरा निवाला मुँह में डाला कि प्यून ने सूचना दी "मॅडम आपको प्रिंसिपल सर ने बुलाया है।" टिफिन बंद करके इस बिल्डिंग से उस बिल्डिंग उतरकर केबिन के पास पहुँची तो देखा कई लोग पहले से कतार में लगे हुए हैं। आधे घंटे बाद मेरा नंबर आया। अब तक तो खा कर आ चुकी होती।

"सर आपने बुलाया..."
"हाँ, आइये, एक जरुरी काम के लिए आपको बुलाया है। गुरुवार के दिन आय. एस. ओ की टीम आ रही है सारी फाइलें तैयार कर लीजिये। हो सके तो सोमवार को ही PPT तैयार करके मिलिए। सुवर्णा मॅडम से कहकर दोपहर दो बजे मीटिंग रखवा लेता हूँ। सारे questions आज ही डिस्कस कर लेंगे। आप भी अपनी टीम को सूचित कर दीजिये। ये डिस्कशन आज ही हो जाये तो आपके लिए आसानी होगी।"

केबिन से बाहर निकली तो हेड क्लर्क ने सूचना दी "मॅडम यूनिवर्सिटी से मेल आया है। आपको पेपर सेंटिंग की टीम में चैयरमेन रखा है। आपको वहाँ रिपोर्ट करना है। मेल फॉरवर्ड कर दिया है।"

इससे पहले कि मैं कुछ कहती मोबाइल की घंटी बज उठी।
मधुलिका ही होगी सोच कर फ़ोन उठाया। सामने से 'सुलेखा' पत्रिका की संपादक बोल रही थी, "कहानी भेज रही हो न? आज आखरी दिन है। सोचा तुम्हें याद दिला दूँ।"

जयश्री सिंह, मुंबई

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