रेखाचित्र : दीपक बिन ज्योति
"मुझे आपकी आवाज अच्छी लगती है।"
'सच?'
"तब क्या, झूठ बोलूँगा?"
'मैंने ऐसा तो नहीं कहा...। अच्छा! बताओ, मैं दिखती कैसी हूँ?'
"दिखती कैसी हैं...., ये मुझे क्या पता?"
"अरे...! पता कैसे नहीं? साल भर में एक दिन भी ऐसा नहीं रहा कि तुम मेरी कक्षा में उपस्थित न रहे हो। बिलकुल पहली बेंच पर बैठ कर सारे लेक्चर सुनते रहे हो तो मैं कैसे मान लूँ कि तुम्हें नहीं पता। चलो बताओ। कुछ तो कल्पना की होगी तुमने! वही बता दो।"
अब तक उसके उसके विषय में मैंने उतना ही जाना जितना कि मेरी आँखों ने देखा था किंतु उसका आकलन और उसकी मासूम कल्पनाएँ मेरी कल्पनाओं से परे की वस्तु थी। उसी कपोल - कल्पना को जानने की बालसुलभ जिज्ञासा उस दिन सहज ही मेरे मन में जागृत हो उठी। प्रथम वर्ष बी. ए. की कक्षा का वह आखरी दिन था। वार्षिक परीक्षा का समय लगभग करीब आ चुका था। छमाही परीक्षा में उसने छियासी प्रतिशत अंक प्राप्त किये थे। अध्ययन के प्रति उस उन्नीस वर्षीय दृष्टिहीन बालक की तन्मयता ने मुझे काफी प्रभावित कर दिया था। इस बीच वो हम सब में काफी घुल मिल भी गया था। उस दिन कक्षा में विषय से हटकर हमने उसकी और केवल उसी की बातें कीं। वह देर तक बोलता रहा हम सब बेरोक टोक उसे सुनते रहे। बातों ही बातों में मेरे द्वारा पूछे गए सवाल ने उसे सोचने पर विवश कर दिया। कुछ देर सोचकर वह बोला,
"ह्म्म्म..... आप..., आप शायद... सांवली हैं।"
"सांवली? सांवली ही क्यों?"
"क्योंकि मेरी माँ कहती है।"
"माँ कहती है....! क्या कहती है तुम्हारी माँ?"
"यही कि मैं सांवला हूँ।"
बेंच पर बैठे - बैठे आगे पीछे झूमना और झूमते हुए सबको सुनना उसकी आदत है। कक्षा में पढाते समय किसी व्यंगात्मक प्रसंग पर उसका खिलखिला कर हँस पड़ना, किसी संवेदनशील घटना पर "ओह!" के प्रकट उद्गार के साथ गहन दुःख प्रकट करना। कहानी के किसी पात्र की मृत्यु की सूचना पर हार जाने के भाव से बेंच पर हाथ पटक कर देर तक 'ना' की मुद्रा में सिर झकझोरना, अपने आप में लगातार धीरे - धीरे कुछ बोलते रहना हम सब को बड़ा अजीब लगता। शुरुवाती दिनों में मेरे साथ - साथ कक्षा के बाकी विद्यार्थी भी उसकी इन हरकतों से डिस्टर्ब सा महसूस करते थे। ऐसा नहीं कि इससे पहले मेरी कक्षा में कभी कोई दृष्टि बाधित या कि डिस्लेक्सिया का छात्र नहीं रहा। दुर्भाग्य से इन दिनों कॉलेजों में निरंतर ऐसे छात्रों की संख्या बढ़ रही है। एक दृष्टि से यह अच्छा भी कि जीवन से लड़कर जीने वाले ये युवा पढ़ लिख कर स्वावलंबी बनने की पुरजोर कोशिश कर रहे हैं। वे अपनी क्षमता को साबित ही नहीं कर रहे बल्कि पूरी जिजीविषा के साथ हम सब के बीच अपनी जगह भी बना रहे हैं। नजीम शेख ऐसे ही छात्रों में से एक है इसके बावजूद वो सबसे अलग है। दुबला - पतला, सांवला, खुशदिल और खुशमिज़ाज। दुनिया की सारी कलुषता से दूर सकारात्मक ऊर्जा से भरपूर निर्मल हृदय वाला यह छात्र अपने निश्छल व्यवहार से सबका चहेता बन चुका था।
लेक्चर में नियमित उपस्थित रहकर वह धीरे - धीरे विषयों के मर्म को समझने की कोशिश करता रहा और मैं उसके आकलन की क्षमता को। बहुत जल्द हम सब ने (मैं और मेरे कक्षा के सारे विद्यार्थी) अध्ययन - अध्यापन की प्रक्रिया में उसकी समझ के साथ अपना तालमेल बैठाकर चलना सीख लिया। पढ़ाते समय किसी उत्साहवर्धक प्रसंग पर वह बेंच पर हाथ पीट कर खिलखिलाकर हँस पड़ता तो हम सब उसके साथ हँस लेते। उसे आनंदित देख मेरे अध्यापन का आनंद दोगुना हो जाता। किसी दुःखद प्रसंग पर उसके "ओह!" के प्रकट उद्गार के साथ मुख मंडल पर छायी मायूस को देख कर मैं पढ़ाते हुए ठहर जाती और उससे पूछ लेती, "क्या हुआ नजीम? बहुत बुरा लगा तुम्हें? कुछ कहना चाहते हो?" हम दो पल ठहर कर उसके भावनाओं को समझने की कोशिश करते फिर उन्हीं भावों के साथ कहानी का तादात्म्य जोड़ कहानी को आगे बढा ले जाते।
वह मेरी मूर्त छवि को आपने मानस में कभी साकार नहीं कर पाया किंतु कहानी में वर्णित पात्रों की अमूर्त संवेदनाओं को अपने मानस में भली भाँति गूँथ लिया करता था। यदि उस दिन कक्षा में मैं महादेवी वर्मा की रचना 'चीनी फेरी वाला' न पढ़ा रही होती तो शायद आज उसके विषय में ये सब न लिखा जाता। पाँच वर्ष की छोटी सी उम्र में माता - पिता को खो देने वाला वह चीनी फेरी वाला भाई - बहनों में सबसे छोटा था। छोटा होने के नाते दिन भर सौतेली माँ के कोप का भाजन उसे ही बनना पड़ता। रात्रि में माँ की मार पीट के डर से वह अपनी तेरह वर्षीय बहन से चिपक कर सो जाता। एक शाम उसकी सौतेली माँ ने उसकी बहन को दुल्हन सा सजा कर कहीं भेज दिया। आधी रात बाद बहन घर आयी और उससे लिपट कर रोने लगी। कुछ रात यही क्रम चलता रहा। एक शाम वह गयी फिर लौट के नहीं आयी। इस घटना से कक्षा के बाकी सारे छात्र दुःखी हुए ही किंतु नजीम में तो जैसे पाँच वर्षीय चीनी बालक मूर्तिमान हो चुका था। एकमात्र अपनी सी लगने वाली उस बहन का यूँ अचानक खो जाना उसे बर्दाश नहीं हो रहा था। देश - विदेश में गरीबी तथा उससे उपजी दयनीय परिस्थियों की चर्चा कर बड़ी मुश्किल से उस दिन मैंने माहौल पर काबू पाया था। उस दिन पहली बार ये महसूस हुआ कि गरीबी से घातक दूसरा कोई रोग नहीं। गरीबी बच्चों का बचपन ग्रस लेती है। किसी घटना - दुर्घटना के बहाने ये गरीबी अपनी चपेट में आने वाले व्यक्ति को उन स्थितियों से बाहर निकल आने के बाद भी ताउम्र छटपटाते रहने के लिए विवश कर देती है।
"नजीम, तुमने कभी अपनी आँखों का ऑपरेशन नहीं करवाया?"
"ऑपरेशन!! ना बाबा ना। ऑपरेशन तो मैं अब कभी नहीं करवाऊँगा।"
"ऐसा क्यों?"
"मेरे पैदा होने के दिन से आज तक मेरी माँ मुझे जेजे हॉस्पिटल ले जा कर छह बार मेरी आँखों का ऑपरेशन करवा चुकी है। जब मैं छोटा था तो वह बहुत रोती थी कि मैं उसकी ओर देखता क्यों नहीं? अब तो मैंने उसे समझा दिया है कि मैं ऐसे ही ठीक हूँ।"
सच कहा था उसने। उस जैसा विद्यार्थी अब कहाँ? जो केवल सुनने के बल पर बिना किसी रियायत के इतने अच्छे अंकों से कक्षा में अव्वल आये तथा अठारह की उम्र पार करते ही अच्छी नौकरी पाने और घर परिवार को गरीबी से बाहर निकाल ले जाने के उद्देश्य से दिन - रात जी तोड़ मेहनत करे।
उन्नीस साल की छोटी सी उम्र में दोनों आँखों के छः बार असफल ऑपरेशन करा लेने के बाद उसने मान लिया कि बाह्य दृष्टि के बिना भी सामान्य से सामान्य व्यक्ति में कोई ऐसी सशक्त आत्मदृष्टि हो सकती है जो जीवन को सरल और सुंदर बनाने की क्षमता रखती है। उसकी यही दृष्टि उससे हर दिन बदलापुर से ठाणे तक की नियमित रेल यात्रा करवाती है। (मुंबई की वह लोकल यात्रा जिसके विकराल रूप को देख कर अच्छे खासे व्यक्ति के भी हाथ - पाँव फूलने लग जाते हैं।)
नजीम ने बचपन में अपनी माँ से सुना था कि उसका रंग सांवला है तब से सारे संसार को उसने सांवले रंग का मान लिया। उसका एक छोटा भाई भी है जो बचपन से चर्म रोग से पीड़ित है। वह वहीं बदलापुर में किसी स्कूल में पढता है। नजीम की माँ कपड़े सिलने का काम करती है। वह बेचारी कभी बड़े को तो कभी छोटे को ले कर अस्पताल के चक्कर लगाने में असमय बूढी होती जा रही है। पिता रोज सुबह नजीम को ठाणे स्टेशन तक पहुँचाकर अनिश्चित मजदूरी की खोज में मुंबई की भीड़ - भाड़ में खो जाते हैं फिर थके हारे सीधे रात में ही घर पहुँच पाते हैं। इस छोटे से संघर्षशील परिवार की आत्मशक्ति दुनिया की तमाम दिखावटी शक्तियों से शक्तिशाली है जो मेहनत की कठिन कुल्हाड़ी से दुःख के पहाड़ को धीरे - धीरे ही सही काटने की क्षमता तो रखती है।
कॉलेज के बाद नजीम अपने जैसे ही एक विद्यार्थी मित्र के साथ ठाणे पूर्व की किसी सहयोगी संस्था में जा कर पढ़ाई करता है। दिव्यांग विद्यार्थियों के लिए कार्यरत उस सहयोगी संस्था में उनके जैसे कुल तेरह विद्यार्थी रोजाना आते हैं वहाँ उन्हें ब्रेल लिपि में पढ़ने की सुविधा उपलब्ध करायी जाती है। प्रतिदिन दो घंटे वहाँ पढ़ कर नजीम अपने उसी मित्र के साथ घर के लिए ट्रेन पकड़ लेता है जो स्कूल के दिनों से उसका साथी है।
नजीम एक गरीब परिवार का बड़ा बेटा है। हर माँ - बाप की तरह उसके माँ - बाप को भी अपने बुढ़ापे की इसी लाठी (नजीम) से बड़ी उम्मीदें हैं। वह लाठी जो स्वयं जीवन भर छड़ी ले कर चलने के लिए मजबूर है।
जयश्री सिंह
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