आलेख : महानगरों में बसंत को हाथ पकड़कर लाना पड़ता है


आजकल हम बड़े जल्दी बोर होने लगते हैं। दस मिनट की यात्रा में मन का साथी साथ न रहा तो बोर, रेस्टोरेंट में पसंदीदा टेबल न मिला तो खाना खाने में बोर, जूते मिल गए पर समय पर मोज़े न मिले तो ऑफिस जाने में बोर, हद तो तब हो जाती है जब सिनेमा हॉल बैठे - बैठे, मॉल में घूमते - घूमते और शादी- पार्टी के माहौल में हर इंसान की मुस्कान से मुस्कान मिलाते हुए भी हमें बोरियत महसूस होने लगे। एक समय था जब छोटी - छोटी बातें खुश कर जाया करती थीं आज एक क्लिक पर उपब्लध मनचाही चीजों का अंबार भी हमें बोर कर देता है।

बच्चे हों या बड़े? कब कौन - सा सवाल किसका मूड ख़राब कर जाये, कह पाना मुश्किल है। आवश्यकता से अधिक पूछा गया एक अतिरिक्त सवाल भी झुँझलाहट पैदा कर देता है। ऐसे में व्यक्ति या तो उत्तर देता ही नहीं या फिर सीधे कह देता है कि 'वह बोर हो रहा है।' इसी बोरियत को इक्कीसवीं सदी ने 'पकाउ' जैसे विशेष शब्द में व्याख्यायित किया है। यह शब्द इस पीढ़ी के लोगों में विशेष कर बच्चों में बहुत अधिक प्रचलित है। इस सदी के नवांकुर बात - बात में पकने लगे हैं और रह - रह कर वस्तुओं एवं व्यक्तियों को पकाऊ होने की उपमा देने लगे है। बात - बात में पकने अथवा बोर हो जाने वाली बात सुनने में सामान्य जरूर लगती है किंतु वास्तव में उसका दूरगामी परिणाम उतना सामान्य नहीं है।

कई बार अनचाहे माहौल में समय बिताने की विवशता हमें उदास कर देती हैं। बात - बात की बोरियत से मिली उदासीनता मन में खालीपन भर देती है। अकस्मात आये खालीपन का भाव हमारे भीतर के उत्साह को कम कर देता है। बाहर से चुस्त - दुरुस्त दिखने वाला व्यक्ति भीतर से निरुत्साहित होते - होते आलसी - सा लगने लगता है। वह छोटे - छोटे बहानों से कहीं आना - जाना अथवा लोगों से मिलना - जुलना टालने लगता है। कभी अपने बेहतरीन कलेक्शन में किसी विशेष आयोजन में पहनने लायक कपड़े न दिखे तो कार्यक्रम में जाने का उत्साह कम हो जाता है। आइने में दो - चार सफेद बाल क्या दिख गए कि शादी - पार्टी जैसे आयोजनों में जाने इच्छा खत्म हो जाती है। मोबाइल की बैटरी उतरते देख झुँझलाहट होने लगती है। गाड़ी की पार्किंग के लिए जगह न मिले तो कार्यक्रम छोड़ घर लौट जाने का मन होता है। बुकिंग की लंबी - लंबी कतारें रही सही कसर को पूरा कर देती हैं।

जब छोटी - छोटी बातें समय - बेसमय हमारा मूड ख़राब कर हमारे उत्साह को कम करने लगे तो बोरियत के समाजशास्त्र को पलटने की आवश्यकता महसूस होने लगती है।

हमारे दैनंदिन जीवन में बात - बात पर उपजी बोरियत की ये  कहानी बहुत पुरानी नहीं है। कोई भी व्यक्ति अपने समय के प्रभाव से अछूता नहीं रह सकता। हमारा समय भूमंडलीकरण और बाजारवाद की मिलीजुली सुविधाओं के अतिरेक का समय है। अकस्मात मिलने वाला एक छोटा सा तोहफ़ा पूरे दिन हमारे मूड को खुशमय बनाये रखता है जबकि पसंदीदा चीजों का अंबार हमें चुनाव की कसौटी रेखा पर खड़ा कर भ्रमित कर देता है। पिछले कुछ सालों में सहज उपलब्ध होने वाली सुविधाओं और त्वरित सेवाओं ने हमारे कथित मूड पर अच्छा - खासा प्रभाव डाला है। शुरुवाती दौर में कदम - कदम पर मिली सुविधाएँ हमें 'चिराग का जिन' मिल जाने की ख़ुशी का आभास कराती थी किंतु इधर कुछ सालों में वस्तुओं - सुविधाओं का अतिरेक हमारे अतिउत्साह में खलल डालने लगा है। आवश्यकता से अधिक का पर्याय हमें रह - रह कर उलझाने लगा है। उत्साह के मार्ग में आयी उलझनें नीरसता को जन्म देने लगी हैं और हम बात-बात में बोर होने लगे हैं। कई चीजें एक साथ हमारे आस - पास घटित हो रही होती हैं और हम हैं कि सब कुछ छोड़ - छाड़ कर एक किनारे जा बैठते हैं।

समय का बोध जीवन शैली को प्रभावित किये बिना नहीं रहता। घडी के काँटे पर चलने वाली आदतें हमें यांत्रिक बना देती हैं। निरी यांत्रिकता जीवन में नीरसता को जन्म देती है और नीरसता उत्साह को कम कर देती है। इस यांत्रिक समय ने और कुछ किया न किया किंतु हममें हर समय 'अप टू डेट' रहने की आदत जरूर डाल दी है। हमारे काम - काज का परफेक्शन प्रोफेशनल लाइफ से आगे बढ़ कर धीरे - धीरे हमारी रुचियों में उतरने लगा है। खाने - पीने से लेकर पहनने - ओढ़ने तक की आदतों में हम परफेक्ट रहने - दिखने के आदी हो गए हैं। सिर के दो - चार सफेद बाल, चेहरे पर कील - मुहासों के दाग़, कपड़ों अथवा एक्सेसरिज़ में इम्परफेक्ट, लंबी ट्रॅफिक, स्लो इंटरनेट जैसी चीजें हमारे मूड को गहरे प्रभावित कर रही हैं।

जब से हमारे हाथ में स्मार्ट फोन आया तब से बोर होने का चलन कुछ अधिक बढ़ गया। स्मार्ट फोन के ब्यूटीफाइड फ़ोटोज़ और त्वरित वीडियोज़ से मिल रहे अटेंशन ने हमें एक अलग तरह के मोहजाल में जकड़ लिया है। सूचनाओं की बाढ़ में हर कहीं अपनी तस्वीर, अपना नाम पाने की आतुरता एक नयी रिक्तता को जन्म दे रही है। जब कभी हमने अपने नाम को मंचीय सूची से दूर पाया हम उदासी के महासागर में डूब गए। हमें अपने नाम का न दिखना जितना दुःखी करता है दूसरे का नेम - फेम उससे अधिक परेशान कर देता है। अंतर्जाल और सोशल मिडिया के झमेलों ने लोकप्रियता की उत्कण्ठा तो बढ़ा ही दी साथ ही प्रतिद्वन्द्व, द्वेष और ईष्या जगाकर व्यक्ति का रहा सहा जीना भी दूभर कर दिया। कुलमिलाकर, इन सारी उलझनों से भाग कर जाएँ तो जाएँ कहाँ वाली फीलिंग ने हमारे हिस्से के बसंत को हमसे कोसों दूर कर दिया।

यांत्रिकता, परफेक्शन और अटेंशन के जाल में जकड़े लोगों के लिए मौसमी बसंत आये तो क्या और जाये तो क्या? सच कहें तो ऐसी मनोदशा में बसंत आता नहीं बल्कि मनोदशा बदलने के लिए बसंत को हाथ पकड़ कर जीवन में लाना पड़ता है। और जब हम ये समझ ही गए कि हमारे जीवन का बसंत हमारे अपने ही हाथ में है तो क्यों न उसका आना भी हम अपनी इच्छा पर निर्धारित कर दें।

यांत्रिकता से निजात पाने के लिए क्यों न कुछ घड़ी को घड़ी के काँटों को ही नजरअंदाज कर दें और कुछ मनमौजी सा जिएँ। क्यों न कभी खाली दिनों में झोला उठाकर ऑफिस से एक घंटे पहले निकल जाएँ और घंटों समंदर किनारे की ठंडी हवा खाएँ। प्रेम में डूबे युगल से तनिक सा दूर बैठकर बच्चों की निश्छल उछल - कूद को देखें और अकारण मुस्कुराएँ।

कुछ समय के लिए अपने स्मार्टफोन से बाहर निकलें। परफेक्शन की चिंता किये बिना जो जी चाहे पहनें और अपने भीतर एक नया आत्मविश्वास जगाएँ। कभी तो मन की गाँठें खोल कर लोगों से मिलें और सबके साथ जीरो प्रॉफिट वाला समय बिताएँ। कभी तो ऐसा भी हो कि हम तरक्की, सैलेरी, पेंशन की बातें टाल कर पुरानी बातों में डूबे और जीवन का वास्तविक आनंद पाएँ। भविष्य की चिंता दर्शाने वाले विज्ञापनों से थोड़ा सा दूर हटकर, वर्तमान की झिक-झिक से थोड़ा बाहर निकलकर, कुछ समय अपने आप के साथ बिताएँ। कभी तो अकेले में खुद से मिलें और बेहरतीन किस्सों को दोहराएँ। कुछ देर के लिए रोजमर्रा से हट कर जिए और यांत्रिकता से दूर ताज़गी का एहसास पाएँ।

वजन, केलोस्ट्रॉल और शुगर की चिंता छोड़ पसंदीदा नाश्तों पर हाथ आजमाएँ। कभी दूसरे के साथ उसके मन का खा कर, तो कभी अकारण कोई उपहार ला कर अपने जीवन में खुशियों की होम डिलीवरी करवाएँ। जब बोर करने लगे ये चमकीले मॉल और मल्टीप्लेक्स तो परिवार के साथ पास के पहाड़ियों (येऊर, माथेरान, लोनावला) की सस्ती सैर पर निकल जाएँ। गाड़ी छोड़ कभी पैदल चलते हुए सड़क के किनारे का जीवन देखें और आवारा भटकने का आनंद पाएँ।

खुशियाँ कहीं दूर नहीं हैं वे बिलकुल हमारे आस- पास हैं। बस हमें अपना मूड ठीक करने की जरुरत है और जरुरत है उस बसंत का हाथ पकड़कर उसे अपने जीवन में लाने की। काम, परफेक्शन और अटेंशन पाने में हमने अपने हिस्से के सारे मौसम लगा दिए। भविष्य की योजनाएँ भी भरपूर हो चुकीं। अब अपनी खुशियों के प्रति भी थोड़ा सा सजग हों जाएँ।

हम काम के मारे लोग शहर में बसंत के आने का नहीं, अपने जीवन को बसंतमय बनाने की योजना बनाएँ।

- डॉ. जयश्री सिंह, मुंबई

(इस माह 'नवनीत', मुंबई में प्रकाशित)

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

कविता - होने का सबूत

कहानी : अंतहीन

कविता : समय के पार कविता