संस्मरण : पीले फूल कनेर के...
अँधेरा हो चुका था। सड़कों की भीड़ गायब हो चुकी थी। घड़ी पर नज़र पड़ी। सवा आठ बज चुके थे। किसी अनजाने शहर में शाम के आठ के बाद का समय भी एक अनजाने भय का कारण बन जाता है। शाम चार बजे जिस रिक्शे से हम होटल से कनक भवन गए थे उसके चालक ने हमारी आपसी बातचीत से भाँप लिया था कि हम शहरी हैं और यहाँ दर्शन के लिए आये हैं। चलते समय दो सौ में लौटने तक की बात तय हुई थी किन्तु शाम तक बातें बना कर उसने जबरन चार सौ रूपये वसूल लिए। होटल से कनक भवन की दूरी तीन – चार किलोमीटर से ज्यादा की न थी। जन्मभूमि, दशरथ महल, कनक भवन और हनुमान गढ़ी ये सारे स्थल दो – तीन मिनट की पैदल दूरी पर आसपास ही स्थित हैं। अत: सारे दर्शन हम एक ही बार में पूर्ण कर चुके थे। लौटते समय रास्ते में तुलसीदास उद्यान व राम पैड़ी पर कुछ पल ठहर कर अंत में सरयु की आरती देखकर हम होटल निकल जाना चाहते थे। किन्तु वह जिद पर अड़ गया कि वह आरती होने तक नहीं रुकेगा। किराया ले कर वह तुरंत निकल जाना चाहता था। हम आज सुबह ही आये थे और कल ही हमें लौटना भी था इसलिए माँ इसी समय सरयु की आरती देख लेना चाहती थी। हमारा रुकना अनिवार्य था और उसे जाने की जल्दी थी मेरे लाख कहने पर भी उसने रुकने से इन्कार कर दिया।
शुरुवात में जो रिक्शे वाला मुझे गरीब लग रहा था वही शाम तक लालची और चालाक लगने लगा। जिसकी दीन दशा पर अब तक मुझे दया आ रही थी उसकी चालाकी देख अब मुझे अपनी उदारता पर गुस्सा आने लगा था। मैं उससे लड़ना नहीं चाहती थी और माँ को इस बात की बिलकुल भी भनक लगने देना नहीं चाहती थी कि वो तय से दुगुनी क़ीमत वसूल कर हमें होटल पहुँचाये बिना पक्के घाट पर ही उतार कर देर होने के बहाने चले जाना चाहता है। मैं जानती थी कि वो गलत है फिर भी उसकी गरीबी देख उसकी चालाकी पर कुछ भी कहना मुझे उचित न लगा। मैंने माँ की ओर देखा। माँ रिक्शे से उतर कर सरयु के प्रथम दर्शन कर प्रणाम करने में व्यस्त थी। मन में कुछ सोच कर बिना बात बढ़ाये मैंने अपना ठगा जाना स्वीकार कर लिया और उसकी ओर चार सौ रूपये बढ़ा दिए। सौ - सौ के चार करारे नोट जेब के हवाले कर फुर्ती से रिक्शे पर पैडल मारता हुआ वह तेजी से निकल गया। मैंने आज ही माँ से सुना था, 'ये देहात से जुड़ा इलाका है यहाँ - कहाँ कोई रिक्शे पर बैठता है। लोग दो - तीन किलोमीटर की दूरी पैदल चल कर ही तय कर लेते हैं।' मेरे दिन भर का निरिक्षण माँ के कहे सत्य को प्रमाणित कर चुका था। ऐसे में उसे आज दो - तीन घण्टे की कमाई के चार सौ रूपये मिल गए थे। इन रुपयों से वह अपने परिवार के न जाने कितने जरुरी काम निपटा लेगा यही सोच कर ठगे जाने के बाद भी मैंने संतोष कर लिया। सरयु की आरती देखने में आठ बज चुके थे। शाम से यहाँ - वहाँ घूम कर हम काफ़ी थक भी चुके थे। अब बस यही इच्छा थी कि जल्दी से कोई रिक्शा मिले और हम होटल पहुँचे।
दिन भर कई रिक्शे वाले यहाँ - वहाँ खाली बैठे दिखते रहे किन्तु इस समय तो जैसे पैडल रिक्शे वालों का अकाल पड़ गया था। अँधेरा बढ़ने के साथ सड़कों पर भीड़ भी कम होती जा रही थी। एक दो रिक्शेवाले दिख भी गए तो वे होटल तक चलने को तैयार न हुए। अब तो स्थिति ये थी कि यदि कोई चलने को तैयार हो भी जाये तो हम उस पर विश्वास भी कितना करें! चिंता, डर, आशंका और माँ की डाँट के आगे मौन रह कर रिक्शा खोजने के अलावा मेरे पास और कोई चारा नहीं था। मैं मन ही मन भगवान को मनाने लगी। अवधबिहारी की भूमि पर उन्हीं से सुरक्षा और सहयोग की प्रार्थना करने लगी। तभी पीछे से सत्तर की उम्र का एक बूढ़ा धीरे - धीरे रिक्शा खींचता हुआ मेरे पास आया। उसकी उम्र और उसकी दशा देख कर मैंने उसे अनदेखा करने की भरसक कोशिश भी की। पर शायद उसने दूर से ही मुझे रिक्शा रुकवाते देख लिया था। मेरे पास आ कर उसने मुझसे पूछा, "कहाँ जाओगी बेटी?" मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि मुझे क्या करना चाहिए? हम दो लोग और वो बूढ़ा। उत्तर में देरी होते देख उसने अपना प्रश्न दुहरा दिया। मुझे लगा कि शायद इसे पैसों की सख़्त जरुरत है तभी तो जब अधिकांश रिक्शे वाले घर जा चुके हैं तब भी वो अकेला सवारी की तलाश में रिक्शा लिए सड़क पर घूम रहा है। प्रतिउत्तर के इंतजार में देर तक वह मेरी ओर देखता रहा। बड़े संकोच से मैंने कहा - होटल रामप्रस्थ। उसने बड़ी गंभीरता से जवाब दिया,”बैठिये छोड़ देता हूँ। ज्यादा नहीं बीस रूपये दे देना।“ इस समय यदि कोई पचास भी माँगता तो हम बैठ जाते! पर उसके लिए तो बीस ही काफ़ी थे। मेरा अंदाजा सही ही था। उस गरीब के लिए उस समय बीस रूपये भी रात के भोजन के लिए पर्याप्त थे। ‘डूबते को तिनके का सहारा’ एक पल को लगा जैसे नियति ने हमें एक दूसरे की सहायता के लिए ही भेज दिया है। हम रिक्शे पर बैठ गए। वो धीमी गति से रिक्शा खींचता चल पड़ा। मैंने मन ही मन भगवान से पूछा, "हे अयोध्यापति! हे नाथ! आपकी नगरी में जीने खाने वाले ये लोग इतने गरीब क्यों हैं?"
मैं मुंबई से अपनी माँ के साथ पहली बार अयोध्या आयी थी। मेरे लिए यहाँ सबकुछ नया था। मैंने बचपन में रामानंदसागर कृत 'रामायण' देखी थी। उसमें दर्शायी गयी अयोध्या नगरी मेरे कच्चे मानस पर रच बस गयी थी। चलते समय मेरे मन में रामजी की अयोध्या को देखने का बड़ा कुतूहल था। मन में अपार श्रद्धा और जिज्ञासा लिए मैं माँ के कहने पर उन्हें साथ ले कर अयोध्या आयी थी किन्तु यहाँ पहुँचने पर जो पाया वो मेरी कल्पना से सर्वथा भिन्न था। मेरे मन में अयोध्या की जो कल्पना थी वैसा यहाँ कुछ भी नहीं था। राजा राम की नगरी बिलकुल फटेहाल सी लग रही थी। तुलसीदास ने अपने रामचरितमानस के जरिये राम की जिस छवि को पूरे विश्व में स्थापित कर दिया उस राम की नगरी को देखने के बाद मुझे लगा कि मैं ही धोखे में नहीं बल्कि आज की इन स्थितियों ने स्वयं रामजी को भी धोखा में डाल दिया है। रामलला की जन्मभूमि सेना छावनी में तब्दील हो चुकी थी। सुरक्षा बलों की कड़ी जाँच से गुजरते हुए ऐसा महसूस हो रहा था जैसे हम सीमा पार किसी पराये देश में प्रवेश कर रहे हों। फूल - माला इत्यादि का दूर - दूर तक नामों निशान न था। मंदिर वाली कहीं कोई बात दिखाई न पड़ी। भूमि तक जाने वाले गलियारों में दुनिया भर की गंदगी पसरी थी। सीता रसोई और राम मंदिर के नाम पर मठाधीश भक्तों को कदम - कदम पर भ्रमित कर उन्हें अपने घरों में बुला कर दर्शन करवाने के नाम पर दक्षिणा के नाम पर पैसे लूटने में जुटे हुए थे।
एक ओर लूटपाट, दूसरी ओर गरीबी और इन सबके बीच कड़ी सुरक्षा जाँच के साथ जन्मभूमि की पुलिस छावनी में प्रवेश। ये सारी परिस्थियाँ मुझ जैसे नये नवेले भक्त के मन से भक्ति का नवजात भाव समाप्त कर देने के लिए पर्याप्त थीं। मुझे आश्चर्य हो रहा था कि इन सबके बाद भी लाखों भक्तगण राम जी के नाम पर दक्षिण - पश्चिम भारत सहित देश – विदेश के कोने - कोने से राम दरबार में कृपा पाने की आस लिए चले आते हैं। कहीं सुना था किसी समय यही अयोध्या नगरी अपने संपूर्ण ऐश्वर्य से भगवान राम के साकेत धाम को भी लजा देती थी और आज लुटेरों और दंगाइयों ने साकेत धाम को लजाने वाली अयोध्या का ये हाल कर दिया कि यहाँ आने वाले विदेशी सैलानियों के आगे इसी अयोध्या की दशा पर हमें खुद ही लजाना पड़ रहा है। आँखों देखे इस कड़वे यर्थाथ से अचंभित, सारी बातों का चिंतन मनन करती हुई मैं सामान्य रूप से गतिशील उसके पैरों की ओर देखती रही। वह बड़ी मेहनत से सम्हलकर पैडल मारता हुआ रिक्शा चला रहा था। होटल पहुँचते ही रिक्शे से उतरकर सेवा पूर्ण कर देने की मुद्रा में वह विनीत भाव से खड़ा हो गया। उसने मुझसे कहा कि, “बिट्टी मैं यहीं थोड़ी दूरी पर रहता हूँ। यदि कल कनक भवन या जन्मभूमि जाना हो तो कहिये मैं सबेरे ही आ जाऊँगा।” हालाँकि हम आज ही सारे स्थलों का दर्शन कर चुके थे। कल सुबह ग्यारह बजे की ट्रेन से ही हमें मुंबई लौटना था। किन्तु जाने से पहले कल एक बार फिर राम जी के दर्शनों की इच्छा थी। उससे सुबह साढ़े सात बजे आने को कहकर तथा पचास का एक नोट उसे थमा कर हम होटल के भीतर चल पड़े। नोट हाथ में ले कर कुछ सोचता हुआ वह वहीं खड़ा रहा फिर रिसेप्शन से आगे हमें कमरे की ओर बढ़ते देख उसने रिक्शा मोड़ लिया।
अगली सुबह साढ़े सात बजे चाय नाश्ता निपटा कर हम कमरे से बाहर निकलने ही वाले थे कि फ़ोन की घण्टी बजी। फ़ोन रिसेप्शन से था मैनेजर ने मुझसे पूछा, "मॅडम आपने किसी रिक्शे वाले को बुलाया था क्या?” मैंने हामी भरते हुए कहा कि हम तैयार हैं, बस निकल ही रहे हैं। हम तुरंत कमरा लॉक करके रिसेप्शन पर आ गए। मेनेजर ने मुझे बाहर की ओर इशारा कर सूचित किया कि यह रिक्शेवाला सुबह साढ़े छह बजे से होटल के बाहर खड़ा है और भीतर की ओर देख रहा है। उसकी मुद्रा से ऐसा प्रतीत होता है कि वह किसी के इंतजार में खड़ा है। इस समय सात पैंतीस हो रहा था और वो पिछले एक घंटे से हमारी प्रतीक्षा कर रहा था। जबकि मैंने उसे साढ़े साथ बजे आने को कहा था। बाहर निकल कर मैंने उससे पूछा, "मैंने आपसे साढ़े सात बजे आने को कहा था फिर आप साढ़े छह बजे ही क्यों आ गए?” वह बड़ी सहजता से बोला,”बिट्टी मेरे पास घड़ी तो है नहीं। मै पढ़ा – लिखा भी नहीं हूँ। क्या समय हुआ है? मै भला क्या जानूँ? मैंने सोचा कि मेरे कारण आपको देर न हो जाये इसलिए सूरज उगते ही यहाँ पहुँच गया।” उसकी बातों ने मुझे निरुत्तर कर दिया था।
दिन के उजाले में उसके चेहरे और हाथ की झुर्रियाँ साफ दिख रही थीं। ऊँचा कद, दुबला शरीर, गहरी छोटी आँखें, धूप में झुलसी हुई काली चमड़ी, जगह - जगह सिला हुआ कुर्ता, मैली सी धोती, पैरों में टूटी हुई चप्पल। साथ में पुरानी सी रिक्शा, फ़टी हुई सीट, उखड़े हुए किनारे। उसका तथा उसके रिक्शे का मुआयना कर मैंने माँ की ओर देखा माँ की आखों में भी यही सवाल था कि क्या इस रिक्शे में बैठना है? बूढ़ा गरीब ही नहीं अत्यंत दरिद्र भी था। उसने हाथ के इशारे से बताया कि यहीं कुछ दूर मेरा घर है। उसके इंगित दिशा की ओर मैंने देखा तो होटल से कुछ ही दूरी पर सड़क किनारे एक टूटा हुआ झोपड़ा दिखाई पड़ा। झोपड़े के आस - पास कनेर के पुष्प की क्यारियाँ थी। इतना सब देखने और जानने के बाद ना कहने का कोई कारण नहीं था मैंने सम्हाल कर माँ को रिक्शे पर चढ़ाया। सीट के किनारे की टीन जगह - जगह से फटी और उखड़ी हुई थी। चढ़ते समय कपड़ों के किनारों में फँसने अथवा फटने के डर से मैं भी बहुत सम्हल कर बैठी। इस बीच वह रिक्शे को कस कर पकड़ा रहा। अपने रिक्शे की स्थिति को वो हमसे बेहतर जानता था। हमारे बैठ जाने के बाद उसने रिक्शे के हैंडल पर टंगा हुआ अपना गमछा निकाला। बड़े धैर्य से गमछे की गाँठ खोलकर उसे मेरी ओर बढ़ा दिया। मैंने चौंक कर पूछा, “ये क्या? और मुझे क्यों दे रहे हैं?” गमछे में कनेल के ढ़ेर सारे ताजे पीले फूल थे। उसके इस व्यवहार से मुझे बड़ा ताज्जुब हुआ। मैंने उन फूलों को लेने से इंकार कर दिया। मेरे इंकार कर देने पर वह कुछ दुखी हो कर बोला, "बिट्टी ये फूल आज सुबह ही तोड़े हैं। आप कनक भवन जा रही हैं तो मेरी ओर से इन फूलों को रामजी के चरणों में चढ़ा देना। मैं तो बिट्टी कभी भीतर नहीं जा पाता। समय पर नहा धो भी नहीं पाता। नहा भी लूँ तो पहनने के लिए दूसरे कपड़े नहीं हैं। यही एक जोड़ी रोज पहनता हूँ। इसलिए भी मंदिर के भीतर नहीं जाता। जब भी कोई सवारी ले कर भवन जाता हूँ तो वहीं मुख्य द्वार पर हाथ जोड़ कर माथा टेक लेता हूँ। आपने कहा था कि आज सुबह आप कनक भवन जाएँगी इसलिए सबेरे जल्दी उठ कर ताजे फूल तोड़ कर ले आया हूँ। इन्हीं से उनके दरबार में मेरी हाजरी लगा देना। मैं न सही किन्तु मेरे भक्तिभाव स्वरूप ये पुष्प उनके श्री चरणों में पहुँच जाएँ तो बड़ी कृपा होगी। वे तो अयोध्या के नाथ हैं सबकुछ जानते हैं। उन्हीं की कृपा है कि हमें रोज रोटी मिल जाती है।" बूढ़ा राम जी की अदृश्य कृपा पर पूर्णरूप से कृतज्ञ था तथा आभार में उन्हें अपने श्रद्धासुमन अर्पित करना चाहता था। उसकी दयनीय दशा को देखने और अब तक की बातें सुनने के बाद मेरी हिम्मत नहीं हुई कि मैं इससे आगे कुछ पूछूँ या कहूँ!
मैंने अपने रुमाल में सारे फूल सहेज कर पर्स में रख लिए। बूढ़ा गंभीर मुद्रा में रिक्शे पर बैठ कर पैडल चलाने लगा। हम सड़क के उस पार पहुँचे ही थे कि उसकी रिक्शा में कुछ खट सी आवाज आई और रिक्शा रुक गया। मैंने पूछा, “क्या हुआ? ये कैसी आवाज थी?” उसने कहाँ कुछ नहीं, बस दो मिनट में ठीक कर देता हूँ। आप बैठे रहिये। दो मिनट में कुछ ठीक कर वो फिर पूर्ववत रिक्शा चलाने लगा। कनक भवन तक पहुँचने में यहीं क्रम दो – तीन बार चलता रहा। वह जानता था कि उसके रिक्शे का मर्ज क्या है? किन्तु वह उसका इलाज़ करवाने में असमर्थ था इसलिए खुद ही कुछ कामचलाऊ उपाय कर आगे बढ़ता जाता। कनक भवन पहुँच कर वह किनारे एक ओर रिक्शा ले कर खड़ा हो गया। हम चप्पल उतार कर सीढ़ी चढ़ने लगे। मुख्यद्वार में प्रवेश कर भीतर आँगन के उस पार मुख्य मंदिर में प्रवेश किया तो पाया कि पट अभी खुला नहीं है। आठ बजने में कुछ ही मिनट बाकी थे कल जिस माली से मैंने फूलों की बड़ी माला लाने को कहा था वो भी अभी आया नहीं था। समय हो चुका था, वह आता ही होगा! यह सोच कर हम भीतर पट के ठीक सामने बैठ गये। जो भक्त पहले से पहुँचे थे वे आँख मूँद रामनाम संकीर्तन में लीन थे। हम भी आँख मूँद कीर्तन का आनंद लेने लगे। थोड़ी – थोड़ी देर में मैं बाहर आँगन की ओर देखती जाती किंतु माली अब भी आया नहीं था। सवा आठ बज चुके थे। मंदिर का पट खुलने ही वाला था। कल उसने कहा का कि पट खुलने से पहले ही वह पहुँच जाता है किन्तु आज तो उसका कोई अता - पता न था। वह कनक भवन का एकलौता माली था। उसके न आने से सारे भक्तगण खाली हाथ ही रघुराई के दर्शन को विवश हो गये थे। भीड़ इतनी हो चुकि थी कि बाहर आँगन की ओर देख पाना मुश्किल हो गया। मैं बहुत आगे पट के बिलकुल सामने खड़ी थी। पट खुला, जय श्री राम के जयकारे लगने लगे, आरती शुरू हो कर अपनी गरिमा के साथ चलती हुई ख़त्म हो गयी। जय घोष होने लगे। मैंने अपने आस – पास देखा किसी के हाथ में फूलमाला नहीं दिखी। यह स्पष्ट था कि माली अब भी नहीं आया है। उस दिन आरती के बाद श्री सीता – राम को फूलों की कोई माला न पड़ सकी। मुझे बहुत अफ़सोस हो रहा था कि आज लौटते समय मै अपने प्रभु को कुछ भी अर्पित न कर पायी। कहाँ तो सोचा था कि चलने से पहले बेला – गुलाब की बड़ी सी माला चढ़ाउंगी और यहाँ तो आज अर्पण के लिए एक फूल तक नसीब नहीं। फूल के विषय में सोचते ही मुझे उस बूढ़े के दिए हुए फूल याद आये। मैंने पर्स में से रुमाल में लिपटे हुए फूल निकाल कर अंजली भर पीले कनेर के ताजे फूलों को राम जी की चरण पादुकाओं पर बिखेर दिया। कुछ फूल पंडित जी को दिए। उन्होंने मंत्रोच्चारण के साथ उन्हें सीता – राम के चरणों में अर्पित कर दिये। उस दिन श्री राम को अपने उसी भक्त के फूल स्वीकार करने थे जो अपने आप को हर कहीं से दीन - हीन मानता था। जो मंदिर के भीतर प्रवेश न कर बाहर से ही शीश झुका कर अपने मालिक को प्रणाम कर लिया करता था। प्रसाद ले कर हम बाहर निकले। माली अब भी नहीं आया। मैं जान गयी थी कि आज माली नहीं आयेगा क्योंकि आज राम जी नहा धो कर आये हुए भक्तों की माला के नहीं बल्कि पूर्ण रूप से पवित्र ह्रदय वाले उस बूढ़े के भावों के भूखे थे। मैं यही सोच – सोच कर गद्गद थी कि इस नेक कार्य के लिए अयोध्यानाथ ने मुझे चुना। उस दिन मंदिर में यह जो कुछ भी घटित हुआ था उसे मेरे और माँ के अलावा और कोई न जान पाया - न पंडित, न माली, न कोई दर्शनार्थी और न ही वह बूढ़ा। उन अदृश्य भावों व संवादों को महसूस कर मैं रोती जा रही थी। मेरे आँसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। बाहर आ कर देखा तो बूढ़ा हमारे इंतजार में खड़ा था। मैंने उसे कहा कि, “बाबा सालों से राम जी को आप ही के फूलों के फूलों की प्रतीक्षा थी। आज उन्होंने आपके भेजे फूल स्वीकार कर लिए।” हम रिक्शे में बैठ गये। वह होटल की दिशा में चल पड़ा। मै दुपट्टे की छोर से आँसू पोछती जाती। मेरे दिल ने कहा धीरे से कहा, “अयोध्या जरुर बदल गयी है किन्तु अयोध्यानाथ आज भी यहीं हैं।”
जिसके दाता राम हों उसे कोई दे ही क्या सकता है? फिर भी, होटल पहुँच कर मैंने उसे कुछ सौ रूपये देने की कोशिश की। किन्तु उस संतोषी जीव के लिए कल के दिए पचास रुपये ही बहुत थे। इसलिए उसने आज कुछ भी लेने से इंकार कर दिया। मै चाहती थी कि वो उन रुपयों को ले ले और वह था कि मेहनत से अधिक कुछ भी लेने को तैयार न था। कुछ पल ठहर कर मैंने कहा, “ले लीजिये। इंकार न कीजिये। इसे राम जी की कृपा समझिये। इसमें आपका रिक्शा भी बन जायेगा और एक जोड़ी कपड़े भी आ जायेंगे।” बहुत संकोच के साथ उसने रूपये स्वीकार किये। साढ़े नौ हो चुके थे। होटल की गाड़ी हमारे इंतजार में तैयार खड़ी थी। हमें देख मैनेजेर ने ड्राईवर से कह कर हमारा सामान डिकी में रखवा दिया। रिसेप्शन पर बिल भुगतान कर हम गाड़ी में बैठ गये। बूढ़ा एक किनारे खड़ा हो कर हमें देखता रहा। आगे के चौराहे से बाएँ घूम कर राम पैड़ी, तुलसी उद्यान तथा हनुमान गढ़ी की गली पार करती हुई हमारी गाड़ी तेजी से स्टेशन की ओर बढ़ चली।
डॉ. जयश्री सिंह
सहायक प्राध्यापक एवं शोधनिर्देशक, हिन्दी विभाग,
जोशी - बेडेकर महाविद्यालय ठाणे, मुंबई - 400601
महाराष्ट्र
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