कविता : मीटू छोटी बच्चियों का हस्तक्षेप

मीटू एक हस्तक्षेप छोटी बच्चियों की ओर से भी; जिससे बड़े अंजान रहे -

गुड़िया, रिंकी, पिंकी
गली में खेलती लंगड़ी
तीसरे नंबर वाले मकान से
वे बराबर रखतीं दूरी
उसमें रहने वाले दद्दा
उन्हें बरामदे में बुलाते
इधर - उधर की बात पूछते
फिर मुँह पर
जबरन बदबूदार मुँह धरते।
लड़कियाँ बड़ों से कहतीं
दद्दा बहुत गंदे हैं
बड़े हँस कर समझाते -
'गंदी बात बेटा। बड़ों के लिए ऐसा नहीं कहते हैं'

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चींकी मिंकी की मम्मी
कामों में उलझी रहतीं
बच्ची को दुलार के कहतीं
जाओं मुन्नी नई फ्रॉक का
नाप दे आओ।
दर्जी वाले भैया
फ्रॉक उठा - उठाकर बड़ी देर नाप लेते
गोटीनुमा उभारों को छूते-दबाते और कहते
मुन्नी कल फिर अकेली आना
नई फ्रॉक पहनाकर देखेंगे
एक बार फिर अच्छे से नाप लेंगे
और बढ़ियाँ सी फ्रॉक सी देंगे।

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चपरासी अंकल
गुड़िया से अक्सर बतियाते
मेरी प्यारी गुड़िया तू मुझे ख़ूब भाती है
गुड़िया भी दद्दा से ख़ूब बतियाती है
किसी दिन दद्दा
कोने में ले जाकर
मुँह पर गंदी वाली लार छुआते
गुड़िया माँ के आँचल में दुबक जाती
ख़ूब रोती स्कूल नहीं जाती
दादी तुनक कर कहती
'बड़कू तुम्हारी लड़की पढ़ना ही नहीं चाहती'

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पड़ोस के चाचू
शाम को फैक्टरी से आते
बिटिया के लिए मीठी वाली टॉफी लाते
बिटिया से लिपट - लिपट कर
टॉफी थमाते
एक दिन बिटिया बोली
टॉफी नहीं लूँगी
गंदी है

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घर - बाहर
लड़कियों ने
कई बदबूदार चुम्मियाँ झेलीं
और सालों बाद
जब विरोध में मुँह खोलीं
तो समझदारों ने कहा -

अरी! लाडो तू पहले क्यों नहीं बोली?

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