कविता : समय के पार कविता
एक भयानक कोलाहल
चारों ओर
सैकड़ों लोग दौड़ते - भागते हाँफते
पीछे चले आ रहे हैं
पलट कर देखती हूँ तो सन्नाटा है
इस कोने से उस कोने तक
कहीं कोई नहीं
एम्बुलेंस की एक उड़ती हुई आवाज
चीखते हुए गुजर जाती है
किनारे बैठे लोग
काली चादर ओढ़े सो चुके हैं
हजारों कदमों की धमक को एक बार में सह लेने वाला शहर का पुराना पुल
शवों के बोझ से थर्रा रहा है
अस्पतालों के गलियारे
पुल में बदल रहे हैं
मौत किनारे - किनारे काली चादर ओढ़े सो रही है
कुछ देखा - अनदेखा किये
सैकड़ों लोग
दौड़ते - भागते - हाँफते
एक दूसरे को धकियाते
गलियारे से गुजरते जा रहे लोग
चीखते पुकारते
हटो..., हटो..,
थोड़ी सी जगह दो
जल्दी करो, जाने दो मुझे
मेरी साँस उखड़ रही है
एक तीसरी निगाह भीड़ पर से उड़ कर गुजर जाती है
शहर बेचैन हो उठता है
टीवी खुली है
खिड़कियाँ बंद हो चुकी हैं
जगह - जगह धब्बे
गहरे काले धब्बे
दृश्यों के साथ उतरते जा रहे धब्बे
आगे कुछ दिखाई नहीं दे रहा
धब्बे घुप्प अँधेरे में बदल रहे हैं
चारों ओर निराशा
मायूसी अकेलापन
बेचैनी घबराहट घुटन संक्रामक हो कर
ज़ेहन में फैल रही है
लोग भाग रहे हैं
अपनों के छू जाने के डर से
बेतहाशा भाग रहे हैं
सारे रास्ते बंद हैं
सारे दरवाजे बंद
महीनों से घरों में बंद लोग
अपने - अपने में बंद हो चुके हैं।
अंतर्द्वंद से निकली बेहद सुन्दर रचना!
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